भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 415 में से

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परित्यक्ता देवा विविधविध सेवा कुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥

अर्थ:—विविध प्रकार से सेवा करते-करते व्याकुल होकर अब ८५ वर्ष से भी अधिक वय हो जाने पर मैंने सब देवों कोछोड दिया है, यदि अब हे मां ! तेरी भी कृपा नहीं होगी, तो हे गणेश जननि ! मैं निरालम्ब किसकी शरण में जाउं ?

यहां ८५ वर्ष की आयु से अधिक समय अन्य देवताओं की सेवा में व्यतीत हो जाने के उल्लेख से यह शंका होती है कि यह स्तोत्र आदि शंकर भगवत्पाद का विरचित नहीं है । संभव है कि चारों मठों की आचार्य परंपरा में किसी अन्य आचार्य का यह विरचित हो सकता है, क्योंकि सब मठों के आचार्य शंकराचार्य ही कहलाते हैं । अन्यथा ८५ वर्ष से भी अधिक वय कहने से सामान्य लोगों का दीर्घायु तक अन्य देवताओं की सकाम उपासना में ही लगे रहने की ओर संकेत है ।

श्वपाकोजल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विरहति चिरं कोटि कनकः ।
तवार्पणे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

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