सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१
उद्धार करने वाली शिवे ! कुपुत्र तो हो सकता है परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः संतिसरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तवसुतः ।
मदीयोंऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥
**अर्थः—**पृथ्वी पर तेरे, हे मां ! बहुत से सरल पुत्र हैं, परन्तु उनमें मैं भी एक विरल चपल तेरा सुत हूं । हे शिवे ! जो तूने मुझे त्याग रखा है, यह तेरे लिये उचित नहीं है, क्योंकि कुपुत्र तो होते हैं परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वादत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥
**अर्थः—**हे जगज्जननि ! हे मां ! मैंने तेरे चरणों की सेवा कभी नहीं की, और हे देवि ! मैं तुझे बहुत धन भी न दे सका, तौ भी तू जो मेरे ऊपर निरुपम स्नेह करती हैं, ठीक है क्योंकि कुपुत्र तो हो सकते है, परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।