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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी


कार्य करती है। स्वतंत्र रूप से उसकी कोई सत्ता नहीं होती, या यों कहें कि शक्तिमान की इच्छा ही शक्ति है। परन्तु वह उसका अंग भी नहीं कही जा सकती; अर्थात दोनों में अंग अंगी का सम्बन्ध नहीं है। दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं कहा जा सकता। जो भिन्नता दीख पडती है, वह सर्वथा व्यवहारिक ही है पहिले शक्तिमान में इच्छा अथवा संकल्प के रूप में उसका उदय होता है फिर वह क्रिया और ज्ञान का रूप धारण कर लेती है। इच्छा क्रिया और ज्ञान के रूपों में अभिव्यक्ति होने पर भी शक्ति एक ही है, और शक्तिमान का ही रूप है; परन्तु वह शक्तिमान का परिणाम अथवा विकार भी नहीं है। क्योंकि ब्रह्म अपरिणामी है।

श्वेताश्वेतरोपनिषत् का कथन है कि :—

ब्रह्मवादियों की समाज में यह प्रश्न उपस्थित हुवा कि हम कहां से पैदा हुवे, हम किस के आधार पर जीवित और प्रतिष्ठित हैं, और किस के कारण सुख दुःख के चक्कर में पडे हैं। तो उन्होंने ध्यान योग द्वारा देखा कि सब का कारण एक शक्ति ही है, जो जड नहीं बरन देवात्मिका चेतन शक्ति है। “ते ध्यान योगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्”। यह हम कह चुके हैं कि शक्ति शक्तिमान की ही इच्छा के परतन्त्र है, अथवा वह शक्तिमान की इच्छा की ही अभिव्यक्ति है। ब्रह्मसूत्र अध्याय १. पाद ४ सूत्र ३ “तदधीनत्वादर्थवत्” के भाष्य में शंकर भगवत्पाद कहते हैं:-