सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें४ | सौंदर्य लहरी
"परमेश्वराधीनात्वियमस्माभिः प्रागवस्था जगतोऽम्युपगम्यते न स्वतंत्रा । अर्थवती ही सा नहि तया विना परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वं सिद्धयति । शक्तिरहितस्य तस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ।
**अर्थ:—**हम तो जगत की प्रागवस्था परमेश्वर के आधीन मानते हैं, न कि स्वतंत्र । क्योंकि वह अर्थवती अर्थात सार्थक है उसके बिना तो परमेश्वर का सृष्टि करना भी सिद्ध नहीं होता शक्ति रहित परमेश्वर में प्रवृत्ति का अभाव होने के कारण ।
जब कि शक्ति की शक्तिमान से पृथक स्वतंत्र सत्ता नहीं, तो शक्ति की महिमा का स्तवन करना शक्तिमान का ही गुणगान करना है । किसी मनुष्य की वीरता अथवा कला कौशल की बडाई करने से उस मनुष्य की ही वडाई समझी जाती है । इसी प्रकार आदि शक्ति की भी उपासना, पूजन, स्तवन आदि द्वारा परमात्मा की ही उपासना, पूजन अथवा स्तवन करना है ।
प्रत्येक ग्रंथ में चार अंग हुवा करते हैं—१ प्रयोजन २ विषय ३ उपाय और ४ सम्बन्ध ।
प्रयोजन | पाठकों को किसी भी ग्रंथ के स्वाध्ययन करने से पहिले यह जानना आवश्यक है, कि ग्रंथकार का इस ग्रंथ के लिखने में क्या प्रयोजन है, उसका विषय क्या है, अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिये ग्रंथकार ने क्या क्या उपाय अथवा साधन बताये हैं, और अन्त में यह भी जानना आवश्यक है कि इन तीनों का परस्पर क्या सम्बन्ध है ।