सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ५
श्री मच्छङ्कर भगवतपाद का किसी भी ग्रंथ के लिखने में मोक्ष के एक मात्र साधन तत्त्वज्ञान की अपरोक्षानुभूति की उपलब्धि के सिवाय दूसरा अन्य प्रयोजन नहीं हो सकता। विषय चाहे कुछ भी क्यों न हो। सौंदर्य लहरी का विषय भगवंती का स्तवन है। स्तुति मनन का एक साधन है, जिससे तत्त्व दर्शन और तत्त्व दर्शन से अपरोक्ष ज्ञान होता है। कोई शंका करे कि योग और उपासना कर्म-कांड के विषय हैं, और कर्म का फल ज्ञान नहीं होता; उनको यह समझना जरूरी है कि योग अथवा उपासना के बहिरंग और अन्तरंग दो स्तर होते है। वहिरंग क्रियाएं कर्म प्रधान हुवा करती हैं, जिनका प्रयोजन मन को परमार्थ की ओर आकर्षित कराना मात्र है। जैसे बालक की पढने में रुचि बढाने के लिये पहिले उसे खिलौनों के विचित्र खेलों द्वारा kindergarten की आधुनिक पद्धति के अनुसार खेल में ही प्रवृत्त किया जाता है। उपासना का बाह्य कर्म-कांड ज्ञान का कारण नहीं। परन्तु उपासना के समय उपासक का चित्त भावना से युक्त होता है। भावना रहित उपासना प्राणहीन समझनी चाहिये। भावना और ध्यान ही उपासना और योग के बाह्य कर्माडम्बर रूपी स्थूल शरीर में प्राण का काम करते हैं।
तज्जपस्तदर्थ भावनम्। (यो. द. १, २८)
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽन्तरायाभावश्च (यो. द. १, २९)
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना (गी. १३.२४)
भगवान का अनन्य, तैलधारा प्रवाहवत, अनवच्छिन्न चिन्तन अथवा योग का "आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचदपि चिन्तयेत्" साधन