सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ | सौंदर्य लहरी
जाय, वह सदा अभाव ही रहेगा । अभाव अथवा सर्वथा विशेषण युक्त अभाव में केवल विकल्प मात्र की प्रतिध्वनि दिखती है । अनन्त बिन्दुओं को एकत्रित करने पर भी क्या कभी कोई संख्याबन सकती है ? फिर किसी संख्या पर उस अभावात्मक बिन्दु को रख देने से उस संख्या का मूल्य क्यों बढना चाहिये ? एक पर एक बिन्दु रखने से उसका भूल्य दस गुणा हो जाता है, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है ? इसलिये वह बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । एक पर एक बिन्दु रखने से उसमें दस की पूर्णता समझी जाती है, और दो बिन्दु लगाने से वह दुबारा दस की पूर्णता प्रदान करती है, अर्थात प्रत्येक बिन्दु की वृद्धि से पूर्णता की वृद्धि होती जाती है, परन्तु शून्य तो सदा शून्य ही है । इसलिये यह कहना अधिक सत्य प्रतीत होता है कि, जिसे शून्य कहते हैं, उस बिन्दु का मूल्य, अभाव नहीं, वरन पूर्ण है । यदि पूर्ण पर पूर्ण जोड कर उसका मूल्य बढ जाय तो प्रथम पूर्ण की अपूर्णता सिद्ध होती है । क्योंकि अनेक पूर्ण नहीं हो सकते, पूर्ण एक ही होना सम्भव है, इसलिये अनेक बिन्दुओं को एकत्रित करने से उनका संग्रह पूर्णता से अतिरिक्त किसी संख्या का निर्माण नहीं कर सकता और प्रत्येक संख्या अपूर्ण वाच्य ही है, क्योंकि पूर्ण की कोई संख्या अथवा गणना नहीं की जा सकती, इसलिये बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । और संख्यायें सब अपूर्ण हैं । गणित विज्ञान का यह सिद्धांत अखिल विश्व पर लागू है । जहां तक नाम रूपों के भेदों की गिनती की जा सकती, वह पूर्ण नहीं कहला सकता और पूर्ण की पूर्णता को हमारी बुद्धि नहीं समझ सकती, क्योंकि उस