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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 415 में से

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सौंदर्य लहरी १७


इस श्रुति में श्रवण, मनन और निदिध्यासन के पूर्व दर्शन वाचक भी शब्द हैं, अर्थात श्रवण मनन और निदिध्यासन के पूर्व आत्मदर्शन होना जरूरी है जो षट सम्पत्ति के साधन से हो सकेगा। आत्मदर्शन होने के पश्चात मार्ग सरल हो जाता है । यह दर्शन प्रज्ञान आत्मा का दर्शन है । जब गुरू उपदेश करता है-“ अयं आत्मा ब्रह्म तत्वमसि ” । अर्थात प्रज्ञात्म दर्शन के पश्चात महावाक्यों के उपदेश से साधक जानता है कि यही आत्मा जिसका उसने दर्शन किया है ब्रह्म है। इस बात का युक्ति और न्याय के आधार पर निश्चय करता है, जिसको मनन कहते हैं। और फिर एकाग्र चित्त से उसी पर सदा अपना लक्ष रखता हुवा ‘ अहं ब्रह्मास्मि ’ का साधन करता है, यही निदिध्यासन है। ‘द्रष्टव्यः ’ शब्द का लक्ष्य आत्मा है जो महावाक्यों के उपदेश के पूर्व द्रष्टा को अपने स्वरूप का लक्ष कराता है और पश्चात ब्रह्म का लक्ष करा कर ब्रह्मात्मैक ज्ञान का साधन बन जाता है।

हम इस बात को उपर समझा आये हैं कि योग का साधन भी ईश्वर प्रणिधान रूपी साधना के बिना समाधि की उपलब्धि के लिये पूर्ण नहीं है। उपासना और योग दोनों साथ साथ रहते हैं। एक दूसरे के बिना अपूर्णता का अनुभव करता है। श्रीमच्छंकर भगवतपाद ने तो सौंदर्य लहरी में कुण्डलिनी योग को प्रधानता देकर, उपासना और योग की एकता ही सिद्ध कर दी है, जो योग की एक तांत्रिक योग पद्धति है । उसका फल है शिव सायुज्य पदवी । देखें श्लोक २२ ।

शून्य एक निषेधात्मक शब्द है, और पूर्ण में सर्वात्मिता का भाव है। यदि बिन्दु को अभाव वाचक समझें तो अभाव पर अभाव कितना भी बढाया

(पार्श्व टिप्पणी: ज्ञानयोग और भावयोग)

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