भारतकोश
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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी १७


इस श्रुति में श्रवण, मनन और निदिध्यासन के पूर्व दर्शन वाचक भी शब्द हैं, अर्थात श्रवण मनन और निदिध्यासन के पूर्व आत्मदर्शन होना जरूरी है जो षट सम्पत्ति के साधन से हो सकेगा। आत्मदर्शन होने के पश्चात मार्ग सरल हो जाता है । यह दर्शन प्रज्ञान आत्मा का दर्शन है । जब गुरू उपदेश करता है-“ अयं आत्मा ब्रह्म तत्वमसि ” । अर्थात प्रज्ञात्म दर्शन के पश्चात महावाक्यों के उपदेश से साधक जानता है कि यही आत्मा जिसका उसने दर्शन किया है ब्रह्म है। इस बात का युक्ति और न्याय के आधार पर निश्चय करता है, जिसको मनन कहते हैं। और फिर एकाग्र चित्त से उसी पर सदा अपना लक्ष रखता हुवा ‘ अहं ब्रह्मास्मि ’ का साधन करता है, यही निदिध्यासन है। ‘द्रष्टव्यः ’ शब्द का लक्ष्य आत्मा है जो महावाक्यों के उपदेश के पूर्व द्रष्टा को अपने स्वरूप का लक्ष कराता है और पश्चात ब्रह्म का लक्ष करा कर ब्रह्मात्मैक ज्ञान का साधन बन जाता है।

हम इस बात को उपर समझा आये हैं कि योग का साधन भी ईश्वर प्रणिधान रूपी साधना के बिना समाधि की उपलब्धि के लिये पूर्ण नहीं है। उपासना और योग दोनों साथ साथ रहते हैं। एक दूसरे के बिना अपूर्णता का अनुभव करता है। श्रीमच्छंकर भगवतपाद ने तो सौंदर्य लहरी में कुण्डलिनी योग को प्रधानता देकर, उपासना और योग की एकता ही सिद्ध कर दी है, जो योग की एक तांत्रिक योग पद्धति है । उसका फल है शिव सायुज्य पदवी । देखें श्लोक २२ ।

शून्य एक निषेधात्मक शब्द है, और पूर्ण में सर्वात्मिता का भाव है। यदि बिन्दु को अभाव वाचक समझें तो अभाव पर अभाव कितना भी बढाया

(पार्श्व टिप्पणी: ज्ञानयोग और भावयोग)

१८ | सौंदर्य लहरी


जाय, वह सदा अभाव ही रहेगा । अभाव अथवा सर्वथा विशेषण युक्त अभाव में केवल विकल्प मात्र की प्रतिध्वनि दिखती है । अनन्त बिन्दुओं को एकत्रित करने पर भी क्या कभी कोई संख्याबन सकती है ? फिर किसी संख्या पर उस अभावात्मक बिन्दु को रख देने से उस संख्या का मूल्य क्यों बढना चाहिये ? एक पर एक बिन्दु रखने से उसका भूल्य दस गुणा हो जाता है, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है ? इसलिये वह बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । एक पर एक बिन्दु रखने से उसमें दस की पूर्णता समझी जाती है, और दो बिन्दु लगाने से वह दुबारा दस की पूर्णता प्रदान करती है, अर्थात प्रत्येक बिन्दु की वृद्धि से पूर्णता की वृद्धि होती जाती है, परन्तु शून्य तो सदा शून्य ही है । इसलिये यह कहना अधिक सत्य प्रतीत होता है कि, जिसे शून्य कहते हैं, उस बिन्दु का मूल्य, अभाव नहीं, वरन पूर्ण है । यदि पूर्ण पर पूर्ण जोड कर उसका मूल्य बढ जाय तो प्रथम पूर्ण की अपूर्णता सिद्ध होती है । क्योंकि अनेक पूर्ण नहीं हो सकते, पूर्ण एक ही होना सम्भव है, इसलिये अनेक बिन्दुओं को एकत्रित करने से उनका संग्रह पूर्णता से अतिरिक्त किसी संख्या का निर्माण नहीं कर सकता और प्रत्येक संख्या अपूर्ण वाच्य ही है, क्योंकि पूर्ण की कोई संख्या अथवा गणना नहीं की जा सकती, इसलिये बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । और संख्यायें सब अपूर्ण हैं । गणित विज्ञान का यह सिद्धांत अखिल विश्व पर लागू है । जहां तक नाम रूपों के भेदों की गिनती की जा सकती, वह पूर्ण नहीं कहला सकता और पूर्ण की पूर्णता को हमारी बुद्धि नहीं समझ सकती, क्योंकि उस

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बुद्धि का ज्ञान स्वयं अपूर्ण है । इसलिये हम उसे शून्य कहते हैं । अभाव का अर्थ भी साधारण भाषामें किसी नामरूपके अभाव का ही द्योतक है । जैसे हमारे पास घडा नहीं है, इसका अर्थ इतना मात्र है कि हमारे पास घडे की आकृति धारण किये हुवे मृतिका का एक रूप नही है । जब विश्व के सब नाम रूपों के अभाव की कल्पना की जाती है, तो उसे हम शून्य कहते हैं । परन्तु वास्तव में क्या वह अभावात्मक शून्य है ? नहीं वरन आदि कारण की पूर्णता का भाव उसमें निहित है । जैसे सिनेमा के पर्दे की तस्वीरें लुप्त होने पर पूर्ण पर्दा दृष्टिगोचर होने लगता है । इसी तरह विश्व के नाम रूपों के अभाव में उसके एकमात्र आधार का, जो पूर्ण है, अनुभव होता है; दर्शन उसको विकार रहित पूर्ण-ब्रह्म कहते हैं । उसकी पूर्णता के कारण ही, विश्व का प्रत्येक नाम रूपात्मक अंग, अपने स्थान पर सत्य और पूर्ण प्रतीत होता है । अभाव का ही दूसरा नाम असत्य भी है, जो बात अथवा घटना जैसी हो वैसी ही न कही या समझी जाय वह असत्य कहलाती है । प्रत्येक वस्तु का यथार्थ ज्ञान सत्य कहलाता है, परन्तु उसकी संख्या, गणना अथवा सीमा बद्ध होनेसे वह ज्ञान अल्प हो जाता है, और निरपेक्ष अनन्त-ज्ञान यद्यपि सत्य है, तो भी बुद्धि की समझ के बाहर का विषय होने से समझ में नहीं आता है । यह रूप है उस पूर्ण परमात्मा का, जिसको वेद 'सत्य ज्ञानं अनंतं ब्रह्म' कह कर व्याख्या करते हैं । अर्थात उस बृहत् अनंत सत्य ज्ञान को ईश्वर कहते हैं । वह ही पूर्ण बिन्दु है । इसलिये एक मत के दार्शनिक विद्वान उसे परबिन्दु भी कहते हैं । परन्तु वह ऐसा गोलाकार बिन्दु है जिसका केन्द्र सर्वत्र है परन्तु सीमांत कहीं भी नहीं । उसका अनुभव साधारण-जन सुषुप्ति में

२० | सौंदर्य लहरी

करते हैं और योगिजन समाधि में; परन्तु उसके सौंदर्य की द्युति सर्वत्र है और उसको सौंदर्य की लहरी में आनन्द की लहर का योगी उपासक अपने अन्तर में अनुभव करते हैं। क्योंकि सौंदर्य का भाव, अधिभौतिक प्रायः दृष्टिगोचर होता है। परन्तु उसकी अध्यात्म प्रतिक्रिया आनन्द में व्यक्त हुआ करती है। हम तीन स्तरों पर एक ही तत्व की अनुभूति इस प्रकार करते हैं। प्रथम स्तर पर वह परमतत्व अद्वैत अक्षर परम ब्रह्म कहलाता है। जगत में उसकी अधिभूता अभिव्यक्ति के सौंदर्य की मोहात्मिका शक्ति का विकास है और अध्यात्म पर आनन्द लहरी का। हम कह चुके हैं कि नामरूपात्म जगत, आदि सत् शक्ति की परिणति है और उसके सौंदर्य में उसी आधिदेवी की सौंदर्य लहरी झलक रही है। इस दृष्टि से प्रथम ४१ श्लोकों का पूर्वार्ध जो अध्यात्म विद्या परक है-आनन्द लहरी नाम से संज्ञित किया गया है। आठवें श्लोक में चिदानन्द-लहरी और २१वें श्लोकोक्त परमानंद लहरी पद इस बात के स्पष्ट संकेत हैं; और अंतिम उत्तरार्ध विराट विश्व में आदि कारणभूता शक्ति जगज्जननी के मुख की सुन्दर झांकी दिखाता है। जैसा कि ४४वें श्लोकोक्त 'तव वदन सौंदर्यलहरी' पद से स्पष्ट है, आधि-भौतिक रूप, आधिदैव की ओर लक्ष्य कराता है। और ३५वे श्लोक में पिण्ड और ब्रह्मांड की एक समानता दिखाने के अभिप्राय से कहा गया है कि दोनों एक चिदानन्द के ही परिणाम मात्र है। क्योंकि यह देह आधिभौतिक तत्वों का ऐसा संघात है, जिसमें परम और अध्यात्म दोनों ही भावों की उपलब्धि होती है। जिनका प्रत्यक्षोक्षण आध्यात्म विद्या का विषय है। परम तत्व का ज्ञेयत्व दो भावों से प्राप्त होता है और उसकी अनुभूति अध्यात्म स्तर पर

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ही की जाती है। उक्त दोनों भावों को हम इन दो नामों के सम्बन्ध से स्पष्ट समझ सकते हैं। प्रथम 'सच्चिदेकं ब्रह्म' और दूसरा 'सच्चिदानन्दं ब्रह्म' प्रथम पद में सद्ब्रह्म के एक प्रज्ञानघन भाव की प्रकर्षता का प्रत्याभास प्रस्फुटित होता है और दूसरे पद में चिदानंदघन भाव की प्रधानता का। इस प्रकार अध्यात्म विद्या के दो फांटे हो जाते है, प्रथम को ज्ञान मार्ग और दूसरे को भक्ति मार्ग कहते हैं; जिनका वर्णन भगवान ने गीता के १२वें अध्याय के २-४ श्लोकों में भी किया है, और प्रथम ज्ञान मार्ग को क्लिष्टतर बताकर दूसरे मार्ग की प्रशंसा की है कि:—

“मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते” (गीता १२–२)
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥ (गी. १२-७)

यहां मय्यावेश्य मनः अथवा मय्यावेशित चेतस् से आनन्द के आवेश का ही अभिप्राय है। क्यों कि ज्ञान का आवेश नहीं हो सकता। आवेश सदा आनन्द का ही हुवा करता है। ज्ञान मार्ग 'अहं ब्रह्मास्मि', 'अयमात्मा ब्रह्म', 'प्रज्ञानं ब्रह्म', 'तत्त्वमसि' महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन का मार्ग है। और दूसरा योग का मार्ग है, उस योग का जिसमे प्रत्यगात्मा के आनन्दावेश से अहंवृत्ति का तादात्म्य किया जाता है। इन दोनों मार्गों को ज्ञान योग और भाव योग भी कहते हैं। प्रथम में शिव तत्त्व की और दूसरे में शक्ति तत्त्व की प्रधानता समझनी चाहिये। वैष्णव सम्प्रदायों में भी राधा तत्त्व, शक्ति तत्त्व, आनन्दावेश प्रदान है और सब

२२ सौंदर्य लहरी

प्राणियों का केन्द्रीभूत आकर्षण पद कृष्ण तत्त्व ज्ञान प्रधान तत्व का वाचक है; परन्तु वैष्णव सम्प्रदायों की द्वैत भावना उपासक को परम तत्व का आभोग मात्र प्रदान कर सकती है। और उस आभोग से तादात्म्यभाव न कराकर अपूर्ण रह जाती है। तथापि उस आनन्दावेश की अन्तिम पहुंच तादात्म्यभाव प्राप्त होने पर ही मिलती है, जैसी चैतन्य महाप्रभु के भावावेश में प्रायः प्रादुर्भूत हुवा करती थी। ज्ञानयोग को भावयोग की अपेक्षा से अभाव योग भी कहा जाता है। कहा है:—

“योगोहि प्रभवाप्ययौ” (कठ)

अर्थात योग दो प्रकार का है प्रभव योग और अप्यय योग। प्रभव योग का मार्ग आनन्दावेश का प्रभव पूर्वक मार्ग है, और अप्यय योग में मनोमय कार्य जगत का परम तत्व में लयक्रम किया जाता है।

शक्ति उपासनायें सब आनन्द भाव की ही योग पद्धतियां हैं। यद्यपि उनमें बहिर कर्मकांड का अधिक समावेश होने के कारण उनके अभ्यन्तर्योग मार्ग से सर्व साधारण की जानकारी नहीं होती, और वे लोग वास्तविकता से दूर रह कर सकाम अनुष्ठान में ही आमरण लगे रहते हैं। श्रीविद्या की अधिष्ठातृ देवी महा त्रिपुर सुन्दरी का स्वरूप चितिशक्ति कहा जाता है, परन्तु चिति-शक्ति को चिन्मयी मात्र मानने से उसकी उपासना ज्ञान परक ही नहीं समझनी चाहिये, वास्तव में वह भी आनन्दावेश युक्त भाव योग का ही मार्ग है, इसलिये श्री भगवत्पाद ने चिदानन्द लहरी और परमानन्द लहरी पदों का प्रयोग किया है।

सौंदर्य लहरी २३


सगुण पंचोपासना

सनातन धर्म में सगुणोपासना के पांच मुख्य सम्प्रदाय है, वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य और सौर, जिनमें एक ही ब्रह्म की क्रमशः विष्णु, शिव, शक्ति, गणपति और सूर्य पांच रूपों में उपासना की जाती है। शंकराचार्य के पूर्व पांचों सम्प्रदायों के अनुयायी आपस में द्वेष बुद्धि रखते थे और आपस में लडा करते थे, परन्तु श्री मच्छंकराचार्य ने सब में एक ही ब्रह्म की उपासना सिद्ध कर के उनका पारस्परिक द्वेष दूर किया और सब को एक ब्रह्मवाद के सूत्र में बांधकर सनातन धर्म का एक संगठन बनाया, तब से सब ही उपासनाओं का लक्ष ब्रह्म प्राप्ति माना जाने लगा है। विष्णु का अर्थ सर्वव्यापी है, इसलिये ब्रह्मांड का स्वामी, जो सगुण रूप से सब का पालन कर्ता है, बहिर्दृष्टि से उपासना करने वालों का इष्ट है। शिव प्रायः निर्गुण ब्रह्म का वाचक समझा जाता है। शिव पद की प्राप्ति निर्विकल्प समाधि द्वारा ही होती है, इसलिये शिव का चित्र सदा समाधिस्त अवस्था में ही दिखाया जाता है। शक्ति परब्रह्म की शक्ति है, जो सारे विश्व में व्यक्त होकर अनेक रूप धारण कर रही है। गणपति शिवशक्ति के योग से समाधि में उदय होने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा का ज्ञान भण्डार है, जिसमें ऋद्धि सिद्धि प्रकट होती हैं। उसका हाथी का सिर यह प्रकट करता है कि साधक का पशुत्व अभी नष्ट नहीं हुवा है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान की बाधक सिद्धियां विघ्न बनकर उसे गिरा सकती हैं, परन्तु ज्ञान तो स्वयं ब्रह्म ही है, ‘सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म’ इसलिये गणेश रूप से ज्ञान रूपी ब्रह्म की उपासना करने वालों को विघ्नों का भय नहीं रहता। सूर्य सारे विश्व का प्राण माना जाता है।

२४सौन्दर्य लहरी

सहस्र रश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्यः ( प्रश्न १–८

इसलिये प्राणोपासना करने वालों के लिये सूर्य भी ब्रह्म प्रत्यक्ष सगुण रूप है ।

हम कह आये हैं कि उपासना का योगसे बडा सम्बन्ध

उपासना का योग से सम्बन्धः- यदि कहा जाय कि उपासना योग का ही अंग है तो अनुचित नहीं, उक्त पांचो उपासनायें योग से किस प्रकार गुंथी हुई हैं यह भी हम नं संक्षेप में बताने का यत्न करते हैं । योग साधन का कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से श्रीगणेश होता है । मेरूदण्ड में जो नाडी सारे शरीर के नाडीजाल का मस्तिष्क से सम्बन्ध करती है, वह ही सुषुम्ना ब्रह्मनाडी विरजा या सूर्य द्वार कहलाती है, जिसके द्वारा भ्रूमध्य आज्ञाचक्र अथवा मूर्धा में प्राण ले जाये जा सकते है । जो योगी प्रयाण समय इस प्रकार प्राण भ्रूमध्य अथवा मूर्धा में ले जाकर प्राण त्याग करते हैं, वे ब्रह्म में लीन हो जाते हैं (देखें गीता अध्याय ८ श्लोक १०, ११, १२, १३,)। उक्त नाडी में ६ चक्र हैं । गुदा के पीछे मूलाधार, उपस्थ के पीछे स्वाधिष्ठान, नाभि के पीछे मणिपुर, हृदय में अनाहत, कण्ठ में विशुद्ध और भ्रूमध्य में आज्ञा, ये छह चक्र क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और मनस्तत्व के स्थान हैं । पृथ्वी का पीत, जल का श्वेत, अग्नि का रक्त, वायु का धूमाकार, आकाश का नील और मन का चन्द्र सदृश वर्ण होता है । विष्णु की सर्व व्यापकता इन छः स्तरों में दिखाने के लिये नीचे पीताम्बर, स्वाधिष्ठान के निकट चांदी की मेखला, नाभि

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माला में गुंथा हुवा रक्त पुष्प, वक्षःस्थल को धूम्राकार वर्णवाला, कण्ठ को नीले रंग का और मस्तक को चन्द्रवत चमकनेवाला दिखाया जाता है । इस लिये ब्रह्माण्ड और पिण्ड में व्यापकता दिखाने के लिये भगवान का चित्र इस प्रकार का खेंचा जाता है । शंख शब्दब्रह्म का द्योतक है । सुदर्शन चक्र काल के नियन्ता सहस्ररश्मि आदित्य का; गदा भगवान के ईशन् शासन का चिह्न है, और कमल सौभाग्यदान का गरुड इस बात को प्रकट करता है कि भगवान के नामस्मरण से पृथ्वी से ब्रह्मलोक तक गति हो सकती है—अथवा षट् चक्र बेध द्वारा सब तत्वों का बेध करके सहस्रार में पहुंचा जा सकता है । प्राण ही महाखग है, जो सुषुम्ना में प्रणव भगवान को लेकर सहस्रार में उडता है । कहा है:—

प्राणान् सर्वान् परमात्मनि प्रणामयतीति एतस्मात् प्रणवः ।
( अथर्व शिखोपनिषत् )

शिव शक्ति उपासना

शिव का रूप परब्रह्म है जो सब तत्वों का प्रकृति सहित लय स्थान है ! इसीलिये उनको सदा समाधिस्थ दिखाया जाता है, और उनका स्थान सहस्रार है । शक्ति ज्ञानाग्नि का रूप है जो सब शुभाशुभ कर्मों को भस्म करके सब तत्वों को अपने अपने कारण में लीन करती हुई सर्व कारणभूत परब्रह्म में लीन करा देती है । शक्ति ब्रह्म के आदि संकल्प की स्फुरणा का प्रथम स्पन्द है । वही चिति शक्ति है, वही प्राण शक्ति है, वही इच्छा क्रिया और ज्ञान शक्ति है और विश्व को धारण करने वाली अनन्त शेष शक्ति और पिण्ड में मूलाधार में

२६ | सौंदर्य लहरी


सोने वाली कुण्डलिनी शक्ति है। जागने पर पशुराज सिंह पर बैठकर अर्थात रजोगुण को दबाकर मनुष्य की सब पाशविक वृत्तियों का संहार करती हुई शिव सायुज्य पदवी देती है। इसीलिये देवी पर पशु बली चढ़ाने की प्रथा पड गई है। मनुष्य अपने अभ्यन्तर पाशविक भावों की बलि न देकर बाह्य बलि देते हैं, और हिंसा करके जगत् जननी को सन्तुष्ट करना चाहते हैं।

या देवी सर्व भूतेषु चेतनेत्यभिधीयते, नमस्तस्यै ३ नमोनमः ।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिता जगत् ,, ,, ,,

दुर्गा सप्तशति के ऊपर दिये हुवे श्लोकों का भाव अथर्वबेद के निम्न मंत्र में भी मिलता है, जिसका यह अर्थ है कि सब प्राणियों की चेतना भगवती का स्वरूप है। इसलिये हिंसा करना भगवती के स्वरूप की हिंसा करना है। अथर्वबेद का मंत्र यह है—

"ते देवा उपाशिक्षन् सा अजानात् वधू सती ।
ईशा वशस्य या जाया सा वर्णमाभ्रत ॥

**अर्थ:—**उन देवताओं ने जानना चाहा (कि इस शरीर में किसका वर्ण अर्थात प्रकाश है) तब वह सती वधू (उनकी इच्छा को) जान गई और उसने बताया कि ईश्वर की जो ईश्वरी जाया (पत्नि) है, वह इस वर्ण का आभरण करती है।

परम ब्रह्म की आदि संकल्प शक्ति जो प्रत्येक सर्ग में सृष्टि और स्थिति का कारण होती है और प्रलय के समय संहार रूपिणी

सौंदर्य लहरी २७

बनकर समस्त त्रिलोक को भस्म करके शंकर की अंगविभूति बनाती है. वह ही महामाया ज्ञानियों को भी मोह में डाल रही है इतर जनों की तो गणना ही क्या है ।

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ (दु स. )

वह अपने भक्तों को कल्प तरु के सदृश मनोवांछित भोग भी देती है, और मुमुक्षुओं को शिव का साक्षात् कराकर शिव सायुज्य पदवी प्रदान करती है । केनोपनिषत् में ब्रह्म का स्वरूप इस प्रकार समझाया गया है:—श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन, जो वाक्शक्ति की भी वाक्, और प्राण का भी प्राण, चक्षु का भी चक्षु है, उसे जानकर बुद्धिमान मनुष्य जीवन मुक्त होकर इहलोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं। जो वाणी से नही कहा जा सकता, जिसके कारण वाणी बोलती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसकी तू (वाणी द्वारा) उपासना करता है वह ब्रह्म नही है। जिसको (मनुष्य) आंख से नही देख सकता, आंख जिसके कारण देखती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना (दृष्टि द्वारा) करता है, वह ब्रह्म नही है। जिसको (मनुष्य) श्रोत्र से नहीं सुन सकता श्रोत्र जिसके कारण सुनते हैं, उसीको तू ब्रह्म जान, जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नही है जिसको प्राण से जीवित नही रखा जाता। प्राण जिसके कारण मनुष्य को जीवित रखते हैं। उसीको ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नही है।

२८ सौंदर्य लहरी

इसलिये जिस ब्रह्म को इन्द्रियां, मन, प्राण भी नहीं जान सकते उसको कैसे जाना जाय, यह बताने के लिये उपनिषत् में एक आख्यायिका द्वारा समझाया गया है कि देवासुर संग्राम में देवताओं की विजय हुई तो देवताओं को अभिमान हुवा कि हमने असुरों को हराया है। उनका अभिमान तोडने के लिये ब्रह्म ने एक यक्ष के रूप में दर्शन दिये। देवताओं ने अग्नि से कहा कि तू जान कि यह यक्ष कौन है। अग्नि से यक्ष ने पूछा कि तू कौन है और क्या कर सकता है, अग्नि ने उत्तर दिया कि मैं जातवेदा अग्नि हूँ, सारे संसार को जला सकता हूँ। तब यक्ष ने एक तृण उसके सामने रखकर कहा कि इसको जलां, परन्तु वह नहीं जला सका। फिर देवताओं ने वायु को भेजा वह भी इसी प्रकार तृण को नहीं उठा सका। जब देवताओं ने देखा कि यह दोनों यक्ष को नहीं जान सके तब उन्होंने इन्द्र से जानने को कहा। परन्तु जब इन्द्र गया तो यक्ष अन्तर्धान हो गया और उसके स्थान पर एक बडी सुन्दर स्त्री प्रकट हुई जो स्वयं हेमवती उमा थी। इन्द्र के पूछने पर उमा भगवती ने बताया कि वह यक्ष ब्रह्म था अर्थात इन्द्र भी ब्रह्म को नहीं जान सका, उमा के बताने पर उसने ब्रह्म को जाना, अतएव ब्रह्म को जानने का एक मात्र उपाय भगवती उमा ही है। शंकर भगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी लिखकर मुमुक्षुजनों पर परम अनुग्रह किया है, जिसमें स्तवन के मिष, श्री विद्या की महिमा, उपासना की विधि, मंत्र, श्री चक्र और षट् चक्रों से इसका सम्बन्ध, षट्चक्रों का बेध एवं तत्सम्बन्धी दार्शनिक विचारों पर प्रकाश डालते हुवे अद्वैत ब्रह्मात्मैक्य अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग दिखाया है।

सौंदर्य लहरी २९


( १ )

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥

अर्थः— यदि शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृष्टि करने को शक्तिमान होता है और यदि ऐसा न होता तो वह ईश्वर भी स्पन्दित होने को योग्य नहीं था इसलिये तुझे हरि और ब्रह्मा की भी आराध्य देवता को किसी भी पुण्यहीन मनुष्य में प्रणाम करने अथवा स्तुति करने की प्रवृत्ति कैसे हो सकती है ?

संक्षिप्त टिप्पणीः—
(१) शक्ति इच्छा ज्ञान क्रिया भेद से त्रिधा होती है, उस के बिना शक्ति रहित शिव कुछ नहीं कर सकता। शिव हं वाच्य है और शक्ति सः वाच्य, इसलिये इस श्लोक से हंसः मन्त्र सिद्ध होता है जिसको उलटा करने से सोऽहं बनता है। सोहं में से स और ह दोनों अक्षरों को हटा दिया जाय तो ॐ शेष रह जाता है। ॐ निर्गुण अक्षर ब्रह्म वाचक है, हंस जीव वाचक और सोहं ब्रह्मात्मैक्य पद है। ह, स दोनो हादि विद्या के प्रथम दो अक्षर हैं, इसलिये सौन्दर्य लहरी में प्रतिपाद्य आनन्द लहरी पद से श्री विद्या का संकेत करते हैं और यह श्लोक इस ग्रंथ का प्रथम मंगलाचरणार्थ लिखा गया है। ह और स दोनों के योग से ह्सौ बीज मंत्र भी बनता है, जिसको प्रेत बीज कहते हैं। इस बीज में शिव शक्ति

सौंदर्य लहरी


ोनों को प्रलय कालीन महासुप्ति अवस्था में दिखाया गया है । त=(प्र+इत) का अर्थ है प्रकर्ष रूप से गया हुआ । प्रत्येक श्वास प्राणिमात्र का हंसः अथवा सोहं जप होता रहता है,

'हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ।
हंसहंसेत्यमुंमंत्रं जीवोजपति सर्वदा ॥'

इसको अजपाजप अथवा अजपा गायत्री कहते हैं ! जप यद्यपि स्वतः होता है, परन्तु उस पर हेतु सहित ध्यान रखने से ही जप का फल हो सकता है । उच्छ्वास के समय सः और निःश्वास के समय हं बीज का शब्द स्वतः होता रहता है । यदि इस के जोड़े का वियोग हो जाय तो श्वास की गति रुकने से यातो मृत्यु हो जावेगी अथवा समाधि हो जायगी । प्रभव के लिये शिव का शक्ति सहित रहना अनावश्यक है । ब्रह्मा विष्णु और हर तीनों क्रमशः रजोगुण, सत्वगुण और तमोगुण की शक्तियों से सृष्टि स्थिति संहार करते हैं, इसलिये आदि शक्ति की अराधना के सिवाय उनमें कुछ भी करने का सामर्थ्य नहीं । आदि शक्ति जब इन त्रिदेव की भी आराध्या हैं, तो हम जैसे अकृत पुण्य उसकी शरण में भी जाने के योग्य कैसे हो सकते हैं, प्रार्थना अथवा स्तुति करना तो दूर की बात है । इसलिये मुमुक्षुओं को भगवती की शरण में रहकर आराधना करना आवश्यक है ।

सृष्टि की रचना ब्रह्मा (विरंची) करते हैं और शिव (हर) संहार करते हैं परन्तु यहां पर सृष्टि का प्रभव शिवजी से होता है ऐसा कहने से शिव या हर शब्द परम शिव अर्थात ब्रह्म वाचक समझना चाहिये । [ब्रह्म कारण वाद]

१. अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, २ जन्माद्यस्ययतः

सौंदर्य लहरी ३१

ब्रह्म सूत्र के उपरोक्त प्रथम सूत्र में यह कह कर कि अब यहां से ब्रह्म की जिज्ञासा आरम्भ होती है। दूसरे सूत्र में ब्रह्म को इस जगत के जन्मादि अर्थात सृष्टि, स्थिति संहार का कारण बताया गया है। कारण दो प्रकार का होता है। प्रथम निमित्त और दूसरा उपादान। जैसे घडे को कुम्हार बनाता है वह घडे का निमित्त कारण है, और उसके बनाने में जिन यंत्रों का प्रयोग किया जाता है वे भी निमित्त कारण ही हैं, परन्तु मिट्टी जिससे घडा बनता है वह उसका उपादान कारण है। सामान्य दृष्टि से इस जगत के उपादान कारण जड प्रकृति के भौतिक तत्व (Physical Elements) हैं, और वैज्ञानिक दृष्टि से भी कोई जड शक्ति (Cosmic energy) जगत का उपादान कारण है, परन्तु केवल जड तत्व बिना चेतन सत्ता का आश्रय लिये कार्य नही कर सकता। इसलिये ईश्वर जगत का निमित्त कारण होना चाहिये जो चेतन है। परन्तु दार्शनिक दृष्टि से शंकर भगवतपाद के अद्वैत मतानुसार ब्रह्म ही उसका अभिन्न निमित्तोपादात कारण है। अर्थात वही निमित्त कारण है, और उपादान कारण भी वही है। कुम्हार भी वही है और स्वयं मिट्टी भी।

ऋग्वेदीय नासदासीय* सूक्त में कहा है—'उस समय न असत्

ऋग्वेद में ब्रह्म का स्वरूप और सृष्टि क्रमथा न सत् था, उसके सिवाय निश्चय पूर्वक अन्य कुछ भी नहीं था। पहिले तम हुआ, तम से छिपा हुआ वह सब लिंग रहित था—परन्तु जल न था। तम रूपी तुच्छ माया से जो था वह

* देखें परिशिष्ट (१)

१२ सौंदर्य लहरी

ढक गया । उसके महिमा रूप तप से एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसने सृष्टि के रूप में वर्तमान होने की इच्छा की । उसके मन से पहिले शक्ति उत्पन्न हुई । बुद्धिमान ऋषियों ने हृदय की जिज्ञासा से जाना के उस असत् में सत् का बन्धु था । मनकी शक्ति को यहां असत् और उस एक पुरुष को सत् कहा गया है । अर्थात ऋषियों ने जब सृष्टि के क्रम को जानने की इच्छा की तो ऐसा समझा कि पहिले सत् और असत् का जोडा उत्पन्न हुआ । सृष्टि के पूर्व न सत् था न असत् था । जो था वह ब्रह्म था । गीता में भी ब्रह्म का स्वरूप ऐसा ही बताया गया है ।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ (गीता १३-१२)

अर्थातः— अनादि परब्रह्म न सत् कहलाता है न असत् । सत् और असत् दोनों परस्पर विरोधी सापेक्षिक शब्द हैं । परब्रह्म निरपेक्ष अक्षर अव्यय सत् असत् से परे हैं । सृष्टि के पूर्व उसके अतिरिक्त कुछ भी न था । वह अकेला था । कोई जड प्रकृति या भौतिक तत्व न थे । अर्थात् अव्यक्त अथवा प्रधान वाच्य जगत का कारण जैसा कि कुछ लोग मानते हैं—न था । सब से पहिले तम (अन्धकार) सा छा गया, यद्यपि उस समय न दिन का प्रकाश था न रात्रि का अन्धकार । अर्थात् वह था महामाया का प्रादुर्भाव । उस माया विशिष्ट ब्रह्म ने अपनी महिमा से ही तप किया । उसका तप ज्ञानमय था ।

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः (मु० १-९)

अर्थः— जो सर्वज्ञ सर्ववित् है, उसका तप ज्ञान मय है ।

सौन्दर्य लहरी ३३

'फिर उसका ज्ञान तमोगुण की शक्ति से आच्छादित होकर, जगत की सृष्टि की कामना करने लगा । इसी स्वरूप को हिरण्यगर्भ कहते हैं । आदि इच्छा शक्ति महात्रिपुर सुन्दरी कहलाती है । इच्छा का संकल्पात्मक कार्य ही मन हैं । कहा है—“संकल्पात्मकं मनः” उस मन के तेजोमय संकल्प से असत् का जन्म होता है । संकल्प के साथ अहं (मैं) का स्फुरण सत् है और संकल्प का कार्य नामरूपात्मिका सृष्टि असत् है । इनको सद्विद्या और असद्विद्या भी कहते हैं । इच्छा के पश्चात ज्ञान तदनंतर क्रिया शक्ति सारे विश्व की रचना करती है । सद्विद्या को ज्ञान और असद्विद्या को क्रिया कहा जा सकता है, जो सत्वगुण और रजोगुण की प्रारंभिक शक्तियां हैं ।

उपनिषदों के भी कुछ प्रमाण हम यहां देना असंगत नहीं समझते ।

“सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” (छा. ६, २, १)

'हे सौम्य, सत् ही यह पहिले था—अकेला अद्वितीय ।

“तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति । (छा. ६, २, ३)

उसने इच्छा की कि सृष्टि बनाने के लिये मैं बहुधा, अर्थात् एक से अनेक हो जाऊं ।

स ईक्षत लोकान्नुसृजा इति, स इमान् लोकानसृजत (ऐत. १, १, १)

३४ | सौंदर्य लहरी

उसने इच्छा की कि लोकों की सृष्टि करूं, उसने लोकों की सृष्टि की।

“स ईक्षां चक्रे स प्राणमसृजत” । (प्रश्न ६. ३)

उसने इच्छा की, उसने प्राण की सृष्टि की।

शैव शाक्त दर्शन के अनुसार सृष्टिक्रम और स्पंदवादनिष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरंजन, अव्यय, अक्षर, परब्रह्म स्पंद रहित है उसीको परशिव महानारायण अथवा महाविष्णु भी कहते हैं, उसको शुद्ध निर्मल वायु मंडल से उपमित किया जाय, तो जैसे निर्मल वायु मण्डल कभीकभी धुंध अथवा कोहरे से आच्छादित होकर मलीन दिखने लगता है,

तद्वत् निर्गुण ब्रह्म में भी सृष्टि के आदि में माया की तमोमयी मलीनता का प्रादुर्भाव होता है। माया को शक्ति अथवा प्रकृति भी कहते हैं। उसका वर्णन शंकर भगवत्पाद ब्रह्मसूत्र (१-४-३) के भाष्य में इन शब्दों में करते हैं—

“अविद्यात्मिका ही बीज शक्ति है, जो अव्यक्त शब्द से निर्दिष्ट की जाती है, यह मायामयी महासुप्ति परमेश्वर के आश्रित रहती है, जिसमें स्वरूप के ज्ञान से रहित संसारी जीव सोते रहते हैं।”

कहीं कहीं इसी को प्रकृति शब्द से भी सूचित किया जाता है, जैसे “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् (श्वे. ४-१०)” परब्रह्म का माया की तुच्छ तमोमयी मलीनता से आच्छादित हो जाना ही उसका प्रथम स्पंद है, इस प्रथम स्तर पर माया के

सौंदर्य लहरी ३५

प्रादुर्भाव के साथ मायाशबल ब्रह्म में शिव तत्व और शक्ति तत्व दोनों की व्यक्तता दिखने लगती है।

अहं प्रत्यय (मैं के ज्ञान) को शिव तत्व कहते हैं, परन्तु शिव तत्व में अहं प्रत्यय अनन्यमुख अहंवमर्ष* युक्त होता है उस अहं अर्थात मैं की स्फुरणा में अपने से अन्य भिन्न वस्तु का ज्ञान नहीं होता, इस समय शक्ति की सत्ता अव्यक्त स्वरूपा है और शिव तत्व पर उसका आवरण मात्र छा सा गया है। यद्यपि अहं अर्थात मैं के उदय के साथ युग पद् इदं भाव अर्थात यह का भाव भी उदय हो जाता है। मैं और यह दोनों भाव युगपद ही उदय ओर अस्त हुवा करते हैं, दोनों का जोडा है, इदं भाव ही शक्ति तत्व है। मानों शुद्ध ब्रह्मस्वरूप आकाश में स्पन्द होने से कुछ आवरण सा छा गया है और उस आवरण में ब्रह्म का तेजोमह प्रकाश भी चमक रहा है। कहीं कहीं उस अव्यक्त माया को आकाश शब्द से भी निर्दिष्ट किया गया है-

जैसे:—
“ एतस्मिन्नु खल्वरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च (वृ. ३, ८, ११)
अर्थ—इस (ब्रह्म) में निश्चय हे गार्गि ! आकाश ओत प्रोत है।


*नोट: — विमर्शोनाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन
विश्व संहारेण वा अकृत्तिमोऽहमिति स्फुरणम् ॥

विमर्श का अर्थ: — विश्वाकार होने और विश्व को प्रकाशित एवं विश्व का संहार करने वाला जो आदि कारण अकृतिम अहंभाव है उसके स्फुरण को विमर्श कहते हैं।

३६ | सौंदर्य लहरी


ब्रह्म देश काल से अतीत है, उसमें आकाश के ओत प्रोत होने की भावना मात्र का होना माया के अस्तित्व का व्यंजक है । आकाश में स्पंद होना संभव है. देश और काल से अतीत ब्रह्म में स्पन्द होना संभव नहीं, क्योंकि स्पंद के प्रसार के लिये देश और उसके क्रम को समय चाहिये और देश और काल दोनों माया के अंग हैं । आकाश में स्पन्द, स्पन्द में शक्ति और शक्ति में ब्रह्म के तेज की द्युति, सब का समन्वय होकर, शिवः शक्त्या युक्तो भवति शक्तः प्रभवितुम् ’ अर्थात शक्ति से युक्त शिव प्रभव करने को शक्त होता है । इसी भाव को मंत्र शास्त्र ने मायाबीज द्वारा व्यक्त किया है, हकार आकाश का द्योतक है, रकार स्पन्द का, ईकार शक्ति का और अनुस्वार ब्रह्म के प्रतिबिंबित तेज का । ब्रह्म में माया का धुंध अथवा अंधकार यद्यपि तमोमय अवश्य है, परन्तु वह हिरण्यमय कान्तियुक्त होता है, इसीलिये उसे हिरण्यगर्भ भी कहते हैं । वेद कहता है कि—

‘हिरण्मयेन पात्रेण सत्यास्यापिहितंमुखम्’

अर्थात सत्य का मुख हिरण्यमय पात्र से ढका हुवा है । हिरण्यमय आवरण में एक कान्ति, प्रभा अथवा श्री होती है मानों आकाश में कांति की छाया बस गई है अर्थात हकार शकार में परिणित हो गया है । शकार और हकार दोनों आकाश तत्व के अक्षर हैं । हकार के स्थान पर शकार रखकर माया बीज ही लक्ष्मी बीज बन जाता है । रकार अग्नि का बीज भी है, अग्नि स्वयं शक्ति-स्वरूप है, और उसका वर्ण हिरण्मय श्री(कांति) युक्त है. परन्तु