भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौन्दर्य लहरी ३३

'फिर उसका ज्ञान तमोगुण की शक्ति से आच्छादित होकर, जगत की सृष्टि की कामना करने लगा । इसी स्वरूप को हिरण्यगर्भ कहते हैं । आदि इच्छा शक्ति महात्रिपुर सुन्दरी कहलाती है । इच्छा का संकल्पात्मक कार्य ही मन हैं । कहा है—“संकल्पात्मकं मनः” उस मन के तेजोमय संकल्प से असत् का जन्म होता है । संकल्प के साथ अहं (मैं) का स्फुरण सत् है और संकल्प का कार्य नामरूपात्मिका सृष्टि असत् है । इनको सद्विद्या और असद्विद्या भी कहते हैं । इच्छा के पश्चात ज्ञान तदनंतर क्रिया शक्ति सारे विश्व की रचना करती है । सद्विद्या को ज्ञान और असद्विद्या को क्रिया कहा जा सकता है, जो सत्वगुण और रजोगुण की प्रारंभिक शक्तियां हैं ।

उपनिषदों के भी कुछ प्रमाण हम यहां देना असंगत नहीं समझते ।

“सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” (छा. ६, २, १)

'हे सौम्य, सत् ही यह पहिले था—अकेला अद्वितीय ।

“तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति । (छा. ६, २, ३)

उसने इच्छा की कि सृष्टि बनाने के लिये मैं बहुधा, अर्थात् एक से अनेक हो जाऊं ।

स ईक्षत लोकान्नुसृजा इति, स इमान् लोकानसृजत (ऐत. १, १, १)