सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ सौंदर्य लहरी
ढक गया । उसके महिमा रूप तप से एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसने सृष्टि के रूप में वर्तमान होने की इच्छा की । उसके मन से पहिले शक्ति उत्पन्न हुई । बुद्धिमान ऋषियों ने हृदय की जिज्ञासा से जाना के उस असत् में सत् का बन्धु था । मनकी शक्ति को यहां असत् और उस एक पुरुष को सत् कहा गया है । अर्थात ऋषियों ने जब सृष्टि के क्रम को जानने की इच्छा की तो ऐसा समझा कि पहिले सत् और असत् का जोडा उत्पन्न हुआ । सृष्टि के पूर्व न सत् था न असत् था । जो था वह ब्रह्म था । गीता में भी ब्रह्म का स्वरूप ऐसा ही बताया गया है ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ (गीता १३-१२)
अर्थातः— अनादि परब्रह्म न सत् कहलाता है न असत् । सत् और असत् दोनों परस्पर विरोधी सापेक्षिक शब्द हैं । परब्रह्म निरपेक्ष अक्षर अव्यय सत् असत् से परे हैं । सृष्टि के पूर्व उसके अतिरिक्त कुछ भी न था । वह अकेला था । कोई जड प्रकृति या भौतिक तत्व न थे । अर्थात् अव्यक्त अथवा प्रधान वाच्य जगत का कारण जैसा कि कुछ लोग मानते हैं—न था । सब से पहिले तम (अन्धकार) सा छा गया, यद्यपि उस समय न दिन का प्रकाश था न रात्रि का अन्धकार । अर्थात् वह था महामाया का प्रादुर्भाव । उस माया विशिष्ट ब्रह्म ने अपनी महिमा से ही तप किया । उसका तप ज्ञानमय था ।
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः (मु० १-९)
अर्थः— जो सर्वज्ञ सर्ववित् है, उसका तप ज्ञान मय है ।