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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 415 में से

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पृष्ठ 71

सौंदर्य लहरी ३१

ब्रह्म सूत्र के उपरोक्त प्रथम सूत्र में यह कह कर कि अब यहां से ब्रह्म की जिज्ञासा आरम्भ होती है। दूसरे सूत्र में ब्रह्म को इस जगत के जन्मादि अर्थात सृष्टि, स्थिति संहार का कारण बताया गया है। कारण दो प्रकार का होता है। प्रथम निमित्त और दूसरा उपादान। जैसे घडे को कुम्हार बनाता है वह घडे का निमित्त कारण है, और उसके बनाने में जिन यंत्रों का प्रयोग किया जाता है वे भी निमित्त कारण ही हैं, परन्तु मिट्टी जिससे घडा बनता है वह उसका उपादान कारण है। सामान्य दृष्टि से इस जगत के उपादान कारण जड प्रकृति के भौतिक तत्व (Physical Elements) हैं, और वैज्ञानिक दृष्टि से भी कोई जड शक्ति (Cosmic energy) जगत का उपादान कारण है, परन्तु केवल जड तत्व बिना चेतन सत्ता का आश्रय लिये कार्य नही कर सकता। इसलिये ईश्वर जगत का निमित्त कारण होना चाहिये जो चेतन है। परन्तु दार्शनिक दृष्टि से शंकर भगवतपाद के अद्वैत मतानुसार ब्रह्म ही उसका अभिन्न निमित्तोपादात कारण है। अर्थात वही निमित्त कारण है, और उपादान कारण भी वही है। कुम्हार भी वही है और स्वयं मिट्टी भी।

ऋग्वेदीय नासदासीय* सूक्त में कहा है—'उस समय न असत्

ऋग्वेद में ब्रह्म का स्वरूप और सृष्टि क्रमथा न सत् था, उसके सिवाय निश्चय पूर्वक अन्य कुछ भी नहीं था। पहिले तम हुआ, तम से छिपा हुआ वह सब लिंग रहित था—परन्तु जल न था। तम रूपी तुच्छ माया से जो था वह

* देखें परिशिष्ट (१)

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