सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें० सौंदर्य लहरी
ोनों को प्रलय कालीन महासुप्ति अवस्था में दिखाया गया है । त=(प्र+इत) का अर्थ है प्रकर्ष रूप से गया हुआ । प्रत्येक श्वास प्राणिमात्र का हंसः अथवा सोहं जप होता रहता है,
'हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ।
हंसहंसेत्यमुंमंत्रं जीवोजपति सर्वदा ॥'
इसको अजपाजप अथवा अजपा गायत्री कहते हैं ! जप यद्यपि स्वतः होता है, परन्तु उस पर हेतु सहित ध्यान रखने से ही जप का फल हो सकता है । उच्छ्वास के समय सः और निःश्वास के समय हं बीज का शब्द स्वतः होता रहता है । यदि इस के जोड़े का वियोग हो जाय तो श्वास की गति रुकने से यातो मृत्यु हो जावेगी अथवा समाधि हो जायगी । प्रभव के लिये शिव का शक्ति सहित रहना अनावश्यक है । ब्रह्मा विष्णु और हर तीनों क्रमशः रजोगुण, सत्वगुण और तमोगुण की शक्तियों से सृष्टि स्थिति संहार करते हैं, इसलिये आदि शक्ति की अराधना के सिवाय उनमें कुछ भी करने का सामर्थ्य नहीं । आदि शक्ति जब इन त्रिदेव की भी आराध्या हैं, तो हम जैसे अकृत पुण्य उसकी शरण में भी जाने के योग्य कैसे हो सकते हैं, प्रार्थना अथवा स्तुति करना तो दूर की बात है । इसलिये मुमुक्षुओं को भगवती की शरण में रहकर आराधना करना आवश्यक है ।
सृष्टि की रचना ब्रह्मा (विरंची) करते हैं और शिव (हर) संहार करते हैं परन्तु यहां पर सृष्टि का प्रभव शिवजी से होता है ऐसा कहने से शिव या हर शब्द परम शिव अर्थात ब्रह्म वाचक समझना चाहिये । [ब्रह्म कारण वाद]
१. अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, २ जन्माद्यस्ययतः