सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ | सौंदर्य लहरी
उसने इच्छा की कि लोकों की सृष्टि करूं, उसने लोकों की सृष्टि की।
“स ईक्षां चक्रे स प्राणमसृजत” । (प्रश्न ६. ३)
उसने इच्छा की, उसने प्राण की सृष्टि की।
| शैव शाक्त दर्शन के अनुसार सृष्टिक्रम और स्पंदवाद | निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरंजन, अव्यय, अक्षर, परब्रह्म स्पंद रहित है उसीको परशिव महानारायण अथवा महाविष्णु भी कहते हैं, उसको शुद्ध निर्मल वायु मंडल से उपमित किया जाय, तो जैसे निर्मल वायु मण्डल कभीकभी धुंध अथवा कोहरे से आच्छादित होकर मलीन दिखने लगता है, |
|---|
तद्वत् निर्गुण ब्रह्म में भी सृष्टि के आदि में माया की तमोमयी मलीनता का प्रादुर्भाव होता है। माया को शक्ति अथवा प्रकृति भी कहते हैं। उसका वर्णन शंकर भगवत्पाद ब्रह्मसूत्र (१-४-३) के भाष्य में इन शब्दों में करते हैं—
“अविद्यात्मिका ही बीज शक्ति है, जो अव्यक्त शब्द से निर्दिष्ट की जाती है, यह मायामयी महासुप्ति परमेश्वर के आश्रित रहती है, जिसमें स्वरूप के ज्ञान से रहित संसारी जीव सोते रहते हैं।”
कहीं कहीं इसी को प्रकृति शब्द से भी सूचित किया जाता है, जैसे “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् (श्वे. ४-१०)” परब्रह्म का माया की तुच्छ तमोमयी मलीनता से आच्छादित हो जाना ही उसका प्रथम स्पंद है, इस प्रथम स्तर पर माया के