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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

सौंदर्य लहरी ४९

दोनों भावों का उदय होने पर एक को अध्यात्म और दूसरे को अधिभूत भाव कहते हैं। अध्यात्म भाव उसी का स्वभाव वाला अर्थात सच्चिदानन्द स्वरूप है और अविनाशी और अपरिणामी भी हे। अधिभूत भाव क्षर और परिणामी है जिसके परिणाम से सारा जगत बनता बिगडता है। अक्षर निस्पन्द परम शिव है और अध्यात्म में अहंता होने के कारण सस्पन्द शिव ईश्वरभाव और जीवभाव का समावेश है। अधिभूत भाव को उद्भव करने वाले भाव को ही आदि शक्ति कहा है जो ब्रह्म का ही एक भाव है। परमभाव को प्राप्त करने के लिये सब स्पन्दों का निरोध करके अहं भाव में स्थिति करनी पडती है। कहा है—“आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ” (गी. ६-२५) अर्थात-आत्मभाव में मन को स्थिर करके इदम् जगत का कुछ भी चिन्तन नहीं करना चाहिये। यह योग का सब से उत्कृष्ट साधन है। यही अहंग्रह उपासना का अन्तिम स्वरूप है और इसी को निदिध्यासन भी कहते हैं।

हिरण्यगर्भसमष्टि प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं जिसको सांख्य महत्तत्व कहता है और वह ही प्राणिमात्र की बुद्धियों का आदि कारण स्वरूप समष्टि बुद्धि है।

प्राणतत्व और हिरण्यगर्भ

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरोह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥२॥
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणिच ।
खं वायु र्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥३॥ (मु.२,१)