सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें५० सौंदर्य लहरी
अर्थः— वह ब्रह्म पुरुष दिव्य और अमूर्त है, अजन्मा बाह्य अभ्यन्तर सर्वत्र व्यापक है, वह प्राण और मन रहित शुभ्र है और अक्षर (प्रकृति, अव्यक्त) से अति सूक्ष्म है। उससे प्राण उत्पन्न होता है, और फिर मन, सब इन्द्रियां, आकाश, वायु, तेज, आप और विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी उत्पन्न होते हैं।
यहां पर महत् के स्थान पर प्राण की उत्पत्ति कही गई है इसलिये समष्टि प्राण जिसको हिरण्यगर्भ भी कहते हैं, महत् तत्व से भिन्न कोई अन्य तत्व नहीं है। शंकर भगवत्पाद ने ब्रह्म सूत्र (२, ४, १३) 'अणुश्च' के भाष्य में समष्टि व्यष्ट्यात्मक विश्व प्राणों को अधिदैविक हैरण्यगर्भ प्राण कहा है। और ब्रह्म सूत्र (१, ४, २) के भाष्य में महत् को हैरण्यगर्भी बुद्धि बताया है। शुद्ध ब्रह्म की तेजोमयी रश्मियां ही जीवन शक्ति रूपी प्राण की किरणें हैं और इस प्रथमज विभु प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं, जैसा कि नीचे दिये मंत्र से भी विदित होता है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सद्दधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
हिरण्यगर्भ की बुद्धि और चित्त दोनों महत्तत्व के ही रूप हैं। महत् से अहंकार की उत्पत्ति होती है। चित्तस्वरूप महत् वासुदेव भगवान विष्णु है, बुद्धि स्वरूप महत् ब्रह्मा और अहंकार रुद्र शिव अथवा हर है। इसलिये आदि शक्ति तीनों की जननी सह आराध्या है।