भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी | ५१

अकृत पुण्य भजन नहीं कर सकते

श्लोक की तीसरी पंक्ति में देवी को हरिहर और ब्रह्मा की आराध्य देवता कहा गया है। क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार असद्विद्या में ही होते हैं। शुद्ध विद्या इनकी भी आराध्या है फिर अकृत पुण्य पापी जीवों की तो वहां गति ही कैसे हो सकती है, वे तो स्तुति और प्रणाम भी नहीं कर सकते। भगवान ने भी गीता में कहा है:—

न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ (७-१)
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ (७-२८)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् (९-१३)

हरि भी रजोगुण की शक्ति लक्ष्मी के बिना पालन नहीं कर सकते, हर भी सत्व गुण की शक्ति उमा की सहायता से संहार करते हैं, तमोगुण के वशीभूत होकर बिना सोचे समझे संहार करना तो विश्व के कल्याणार्थ नहीं हो सकता, उनकी संहार शक्ति इसलिये सात्विक ज्ञानमयी है। और ब्रह्मा की सृष्टृत्व शक्ति, तामसी मोहासक्ति के बिना उनके ज्ञान वैराग्य पर आवरण डाले, सृष्टि कार्य में उन्हें कैसे प्रवत कर सकती थी। इसलिये ब्रह्मा तमोगुण की शक्ति से युक्त होकर सृष्टि करते हैं। प्रथम मानसिक सृष्टि के सनकादि पुत्रों में ज्ञान वैराग्य देखकर तो उन्हें मैथुनिक सृष्टि क