सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ सौंदर्य लहरी
आश्रय लेना पडा । इसी लिये श्लोक में कहा गया है कि है मां ! तू ही तीनों की आराध्या है ।
दीक्षा का शक्ति से सम्बन्ध ।
गुरु को शिव स्वरूप कहते हैं । जब गुरु शक्ति से युक्त होता है तब ही वह दीक्षा देकर शिष्य की प्रसुप्त शक्ति कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है अन्यथा नहीं । जब तक शक्तिसंपन्न गुरु का अनुग्रह नहीं होता, तब तक शिष्य चाहे कितना भी विद्वान क्यों न हो, पुस्तकों से पढे हुवे मन्त्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता । भगवान राम और कृष्ण को भी गुरु करना पडा था, फिर अन्य साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है । अकृतपुण्य पापी जन तो गुरु की शरण में जा ही नहीं सकते, जब अनेक जन्मों के पुण्यों का उदय होता है तब ही सद्गुरु का समागम मिलता है । शक्ति के बिना जैसे शिव स्पन्दितुमपि न कुशलः तद्वत शक्ति के बिना शिव स्वरुप गुरु भी शिष्य में शक्ति जागरण करने की कुशलता नहीं रखता और शिष्य में भी मंत्र चैतन्य का प्रकाश नहीं होता । मंत्र चैतन्य के बिना मंत्र सिद्धि की बात करना तो बालू से तेल निकालने के बराबर है ।
शिष्य में भी उसका अन्तरात्मा शिव है, परन्तु वह शिव उसको माया की भ्रांति में डालता रहता है ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गी. १८-६१)