सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी ५३
उसकी शरण में अकृत पुण्य नहीं जा सकते। पुण्य प्रभाव से जब सद्गुरू की प्राप्ति होती है, तब गुरू शिष्य की शक्ति का जागरण करके उसे शक्ति से युक्त कर देता है और शक्ति से युक्त होकर शिष्य का अन्तरात्मा स्पंदित होता है और मोक्ष का पथ-प्रदर्शन कराता है। इसलिये जब तक शक्ति का जागरण नहीं होता, शिष्य भी गुरु का अनुगृहीत नहीं होता अर्थात् शिष्यस्थ शिव स्पंदित नही होता।
श्री विद्या
श्री विद्या आदि ब्रह्म विद्या है उसके कादि और हादि मन्त्रों के अनुसार दो अंग होते हैं जिनके दो प्रथम अक्षर शिव और शक्ति के द्योतक हैं और उन्हीं के आधार पर पूर्ण विद्याएं सिद्ध होती हैं। अर्थात् शक्ति के योग के बिना शिव का अक्षर अकेला मन्त्र नहीं बना सकता। तीसरा अक्षर सदारुय तत्व, चौथा महेश्वर और पांचवा शुद्ध विद्या के द्योतक हैं। दोनों अक्षरों के पश्चात् तीसरा काम का द्योतक है। चौथा फिर शिव वाचक है जिसके काम अर्थात ईक्षण (इच्छा) से पृथ्वी तक व्याप्त है। पांचवा अक्षर पृथ्वी का अक्षर है। इस प्रकार ईश्वर, जीव और विश्व का भेद दिखाने वाला दूसरा कूट विद्या कला का संकेत कराता है। तीसरा कूट शक्ति कूट है जो प्रतिष्ठा और निवृत्ति का संकेत कराता है। इस प्रकार कादि विद्या प्रभव मन्त्र है। इसलिये इस श्लोक में यह पद कि शक्ति के योग से ही शिव प्रभव करता है श्री विद्या का प्रतिपादन करने वाले इस ग्रंथ के प्रथम श्लोक में मंगलाचरणार्थ लिखा गया है।