सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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उसकी शरण में अकृत पुण्य नहीं जा सकते। पुण्य प्रभाव से जब सद्गुरू की प्राप्ति होती है, तब गुरू शिष्य की शक्ति का जागरण करके उसे शक्ति से युक्त कर देता है और शक्ति से युक्त होकर शिष्य का अन्तरात्मा स्पंदित होता है और मोक्ष का पथ-प्रदर्शन कराता है। इसलिये जब तक शक्ति का जागरण नहीं होता, शिष्य भी गुरु का अनुगृहीत नहीं होता अर्थात् शिष्यस्थ शिव स्पंदित नही होता।
श्री विद्या
श्री विद्या आदि ब्रह्म विद्या है उसके कादि और हादि मन्त्रों के अनुसार दो अंग होते हैं जिनके दो प्रथम अक्षर शिव और शक्ति के द्योतक हैं और उन्हीं के आधार पर पूर्ण विद्याएं सिद्ध होती हैं। अर्थात् शक्ति के योग के बिना शिव का अक्षर अकेला मन्त्र नहीं बना सकता। तीसरा अक्षर सदारुय तत्व, चौथा महेश्वर और पांचवा शुद्ध विद्या के द्योतक हैं। दोनों अक्षरों के पश्चात् तीसरा काम का द्योतक है। चौथा फिर शिव वाचक है जिसके काम अर्थात ईक्षण (इच्छा) से पृथ्वी तक व्याप्त है। पांचवा अक्षर पृथ्वी का अक्षर है। इस प्रकार ईश्वर, जीव और विश्व का भेद दिखाने वाला दूसरा कूट विद्या कला का संकेत कराता है। तीसरा कूट शक्ति कूट है जो प्रतिष्ठा और निवृत्ति का संकेत कराता है। इस प्रकार कादि विद्या प्रभव मन्त्र है। इसलिये इस श्लोक में यह पद कि शक्ति के योग से ही शिव प्रभव करता है श्री विद्या का प्रतिपादन करने वाले इस ग्रंथ के प्रथम श्लोक में मंगलाचरणार्थ लिखा गया है।
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श्री विद्या का आधार वेद-वेदांत
जब तक किसी विद्या के आधार वेद नहीं सिद्ध होते, तब तक वह विद्या ऋषियों को मान्य नहीं होती, परन्तु श्री विद्या तांत्रिक है और वह श्री गौडपादाचार्य शंकराचार्य प्रभृति की इष्ट थी, इसलिये उसे श्रुतियों का आधार है यह बात निश्चित ही है। परन्तु हम यहां विशेष रूप से इस विषय पर विचार करने का यत्न करते हैं। वेदों के मत से ईश्वर ही सृष्टि का कारण है। यह बात 'जन्माद्यस्ययतः' (ब्र. १, १, २) में कही गई है। क्योंकि सब शास्त्र ऐसा ही सिद्ध करते हैं और जहां कहीं उनके सृष्टि क्रम में भिन्नता दिखाई देती है, उन सब का समन्वय किया जा सकता है यह बात, 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्रं. १, १, ३) और 'तत्तुसमन्वयात्' (ब्र. १, १, ४) इन दो सूत्रों में सिद्ध की गई है। जो लोग सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से स्वतंत्र किसी अन्य प्रकृति तत्व से सिद्ध करते हैं, उनके वादों का खण्डन ग्रंथ के उत्तर भाग में किया गया है। कोई-कोई वाद ईश्वर को मानकर भी प्रकृति की सत्ता स्वतंत्र अथवा अंग-अंगी भाव से बताकर ईश्वर को केवल निमित्त कारण ही मानते हैं, वे वाद भी श्रौत नहीं हैं, जैसा कि श्रुतियों के पढ़ने से स्पष्ट प्रतीत होता है। क्योंकि कहीं तो सृष्टिका उदय ईश्वर के ईक्षण या कामनासे वर्णित है, कहीं एजृत्व अर्थात स्पन्दनसे वर्णित है, कहीं मायासे, कहीं शक्ति से, कहीं प्रकृति से। उस परमात्म शक्ति कोही कही आकाश, कहीं अग्नि, कहीं माया, कहीं प्राण, कहीं वायु, कहीं प्रकृति प्रभृति शब्दों से व्यक्त किया गया है। इसका कारण यह है कि उस आदि शक्ति का स्वरूप किसी की समझ में नहीं आ सकता, इसलिये
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श्रुतियों में उसे समझाने के लिये अनेक प्रकार से चेष्टा की गई है। परन्तु सब श्रुतियों का अभिप्राय एक ही है। वह ईश्वर में उसके अधीन अव्यक्त अथवा व्यक्त दशामें सदा रहती है। शंकर भगवत्पाद 'तदधीनत्वादर्थवत्' (ब्र. १, ४, ३) और 'ज्योतिरूपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके', (ब्र. १, ४, ९) के भाष्य में इस बात को स्पष्ट करते हैं और उस शक्ति को दैवी शक्ति कहते हैं।
“यथा प्रकरणात्तु सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा नामरूपयोः प्रागवस्थानेनापि मंत्रेणाम्नायत”,
**अर्थ:—**प्रकरण के अनुसार तो वह ही दैवी शक्ति जो नाम रूप से विकृत नहीं है, नाम रूपों की पूर्व अवस्था के रूप में वेदोक्त मंत्र में कही गई है।
माया की अभिव्यक्ति, ईश्वर का ईक्षण अथवा संकल्प, ईश्वर का एजृत्व (एजृ कंपने) अर्थात स्पन्द सब सृष्टि के पूर्व में शक्ति के आन्दोलन के सूचकअर्थ पद हैं। यह कहना कठिन है कि पहिले इच्छा अर्थात ईक्षण हुवा अथवा पहिले संकल्प हुवा, अथवा पहिले स्पन्द हुआ। जिसने जैसा समझा वैसा ही वर्णन भिन्न-भिन्न प्रकार से उसने किया है। उपरोक्त नासदासीय सूक्त में पहिले तम (माया) फिर काम (संकल्प) फिर रेतस् (स्पंद) का क्रम मिलता है। परन्तु सर्वत्र यह ही क्रम नहीं दिखता। परन्तु इस बात में सब श्रुतियों का एक मत है कि चाहे वह माया हो, चाहे इच्छा, चाहे स्पन्द सब हैं एक ब्रह्म सम्बन्धी व्यापार ही। ब्रह्म की उस अवस्था को कहीं
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ईश्वर कहा है, कहीं उसकी शक्ति, केवल नाम की भिन्नता है। शक्तिवादी उसको ईश्वर की दैवी शक्ति कह कर उपासना करते हैं, अन्य लोग उसे ईश्वर ही कहते हैं। वेदों में दोनों प्रकार का उपासना क्रम मिलता है कहा है—
‘ त्वमेव माता च पिता त्वमेव इत्यादि, त्वमेव सर्वं मम देव देव ’॥
मन्त्र शास्त्र के विद्वानों ने सृष्टि की उत्पत्ति शब्द से ही मानी है, और वे शब्द को अनादि शब्द ब्रह्म कहते हैं शब्द भी स्पन्द का ही रूप है। प्रथम शब्द ॐ है जो अ, उ, म के योग से बनता है। अकार सारी वैखरी वाणी की भूमि है। जिस पर अन्य वर्णों के नाम रूप रचे जाते हैं। ॐ भी अकार का ध्वन्यात्मसानुनासिक शब्द है। ऐतरेय अरण्यक में कहा है कि अकार ही समस्त वाणी है।
अकारो वै सर्वा वाक् सैषा स्पर्शान्तस्थोष्माभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति । (ऐ. आ. २.३ ७ १३)
अर्थात अकार ही सारी वाणी है। वह ही स्पर्शों, अन्तस्थ और उष्मा से युक्त होकर व्यक्त होती है और नाना रूपों वाली हो जाती है।
ऊपर हम बता आये हैं कि ऐं. ह्रीं, श्रीं, क्लीं भी ॐ के ही रूप हैं, और शक्ति प्रणव कहलाते हैं। उनका शक्ति और स्पन्द तथा संकल्प से सम्बन्ध भी वहां दिखाया जा चुका है। परन्तु सृष्टि के पूर्व चारों में से पहिले कौनसा उदय हुवा और पीछे कौनसा यह कहना असंभव है। जिस ऋषि ने जो क्रम समझा
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उसने अपनी उपासना उसी क्रम से की, और अपना मंत्र भी उसी क्रम से बनाया। इसलिये प्रत्येक मंत्र का ऋषि देवता और विनियोग जानना आवश्यक है। इसी प्रकार श्री विद्या के अवान्तर भेदों को समझना चाहिये। सबके मूल में दो ही विद्या हैं जो कादि और हादि के नाम से प्रसिद्ध हैं, कादि विद्या में सृष्टि का उदय काम (संकल्प) से माना गया है और हादि में आकाशवत् अव्यक्त शिव की माया शक्ति से। दोनों के प्रथम कूट में ही अन्तर है और वह भी प्रथम तीन अक्षरों में, कादि में काम से शक्ति, शक्ति में तुरियावस्था और उससे पृथ्वीतक सारी सृष्टि कही गई है जो मायाशक्ति का ही रूप है; हादि में अव्यक्त आकाशरूपी ब्रह्म से स्पन्दशक्ति, उससे कामपूर्वक पृथ्वीतक सारी सृष्टि का उदय दिखाया गया है। दूसरे काम कला कूट में ईश्वर से शक्ति की जीव रूपी पराप्रकृति का उदय बताकर फिर संकल्पपूर्वक पृथ्वी तक की शारीरिक सृष्टि दिखाई गई है जिसमें ईश्वर की व्यापकता का ओतप्रोत रहना भी स्पष्ट है, कहा है—
‘स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत’
ऐतरेयोपनिषत् (१, ३, १२)
अर्थात् वह ईश्वर उस (शरीर) में ही सीमा (कपाल के ऊपर के जोड) को विदार कर उस (छिद्र) के द्वारा प्रवेश कर गया अर्थात् जीव बन गया।
तीसरे कूट का भाव स्पष्ट है कि समस्त कलाओं सहित सब कुछ माया शक्ति का ही दिखावा है। तीनों कूटों के अंतिम माया
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बीज से यही बात झलकती है कि तीनों स्तर शक्ति अथवा माया के ही रूप हैं, जो ईश्वर के आश्रय से उदय अस्त होती रहती है । आदि शक्ति को वेदों में श्री संज्ञा दी गई है । इसलिए इस विद्या का नाम श्री विद्या अर्थात ब्रह्म की श्री की विद्या प्रसिद्ध है जो ब्रह्म विद्या ही है । देखे श्री सूक्त के १५ मंत्र । पंच-दशी में भी १५ ही अक्षर हैं । कहा है:—
श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्याऽहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौव्यात्तम,....इत्यादि (यजुर्वेद)
**अर्थात:—**हे ईश्वर यह तेरी श्री लक्ष्मी तेरी पत्नि है, जिसके दिन रात्रि पार्श्व हैं, नक्षत्र रूप हैं, जिससे सब व्याप्त है ।
श्री विद्या का एक रूप षोडशी विद्या भी प्रसिद्ध है, उसके भी कामादि षोडशी, रमादि षोडशी, मायादि षोडशी, वागादि षोडशी, तारादि षोडशी अवान्तर भेद हैं । ये भेद उस ही दृष्टि से समझे जाने चाहिये । जिसने काम से सृष्टि मानी, उसने कामादि की उपासना की । जिसने श्रीसे सृष्टि मानी उसने रमादि की, जिसने माया से सृष्टि मानी उसने मायादि की और जिसने शब्द से सृष्टि मानी उसने वागादि की उपासना की । तदनुसार उनके मंत्रों में बीजों का क्रम भी भिन्न-भिन्न होता गया । ये सब मंत्र लोम-विलोम क्रम से प्रभव और अप्यय उभयपर हैं ।
श्री विद्या की उपासना अति प्राचीन है । शंकर भगवत्पाद भी श्री विद्या के उपासक थे यह बात असंदिग्ध है ।
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हकार से शिव और सकार से शक्ति का ग्रहण किया जाता है, जो महावाक्यों का मंत्रात्म स्वरूप है। सः जीव शक्ति है, और अहं का स्फुरण ब्रह्म की तेजोमयी अध्यात्म किरण है। हं शिव वाचक है, उसके पूर्व निषेधात्मक अकार लगा देने से उसकी जीव संज्ञा हो जाती है। इसलिये सःहं, अथवा सोहं का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए कि सःजीव शक्ति, हं शिव स्वरूप है। ह, स. अथवा हंसः का अर्थ इसी प्रकार यह होता है कि शिव ही जीव बन गया है। इस प्रकार शिव तत्व का अहं वृत्ति के आधार पर तत्वानुसंधान करते-करते निषेधात्मक अकार का त्याग करके ब्रह्मलीनता प्राप्त करने के इस साधन क्रम को, अहंग्रह उपासना कहते हैं।
श्री विद्या गायत्री का भी तांत्रिक रूप समझा जाता है। वह निर्गुण ब्रह्म जगत का आदिकारण सविता अर्थात प्रसूता, जन्मदाता वरण करने के योग्य है, यह बात गायत्री के प्रथम पाद में कही गई है। वह ध्यान का विषय न होने के कारण वरेण्यम् है, ध्येयं नहीं, इसलिये उसकी तेजोमयी सत्ता 'भर्गस' का ही ध्यान संभव है। यह बात दूसरे पाद में कही गई है। बुद्धि ध्यान का यंत्र है, वह ध्यान द्वारा ब्रह्म में तल्लीनता होने को प्रवृत्त होनी चाहिये। इसलिये प्राणस्वरूप रुद्र की सहायता से उस पद की उपलब्धि की जिज्ञासा तीसरे पद में दिखाई गई है। गायत्री मंत्र का श्री विद्या से सम्बन्ध इसी विचार धारा से सिद्ध होता है। देखें त्रिपुरातापिन्युपनिषद् ।
ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी ने भी श्री विद्या की उपासना की थी और उनके उपास्य मंत्र क्रमशः ब्राह्मी, वैष्णवी और शांकरी विद्याओं के नाम से प्रसिद्ध है।
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श्री चक्र — श्री विद्या का स्थूल शरीर श्री चक्र है, जिसमें महात्रिपुर सुंदरी का निवास स्थान है। इसलिये श्री चक्र ब्रह्माण्ड का प्रतीक है और मनुष्य देह भी श्री चक्र ही है। श्री चक्र में चार शिव कोण और पांच शक्ति कोण होते हैं। (देखे श्लोक ११) दोनों के योग से ही सम्पूर्ण चक्र बनता है, इनके योग के अभाव में केवल केन्द्रीय बिन्दुमात्र रह जाता है जो परशिव प्रतीक है।
दूसरे श्लोक में सर्व शक्तिमान परमेश्वर की अनंत शक्ति की महानता दिखाते हैं।
( २ )
"तनीयांसं पांसुं तव चरणपंकेरुहभवं
विरिञ्चिः संचिन्वन्विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरः संक्षुभ्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ।
तनीयांसं = छोटा, पांसुं = कण
अर्थ — “ तेरे चरण कमल से उत्पन्न होने वाले छोटे से एक रजकण को चुनकर ब्रह्मा बिना विकलता के लोक लोकान्तरों की रचना करता रहता है और शेषनाग उसको जैसे तैसे अर्थात बडे परिश्रम से सहस्र शिरों पर उठा रहा हैं
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( धारण कर रहा है ) और हर उसकी भस्म बनाकर अपने अंग पर लगाते हैं” ॥२॥
[ शक्ति अनन्तता इस श्लोक में दिखाई गई है । उसकी सापेक्षता से ब्रह्मा, शौरि ( शेष ) और हर की शक्तियां तुच्छ हैं, क्योंकि वह अनन्त ब्रह्माण्डों की स्वामिनी है, और ये एक ब्रह्माण्ड के ही अधिदेव हैं । ]
विरिञ्चः या विरञ्चिः ब्रह्मा को कहते हैं, और शौरिः विष्णु का नाम है । शेषशायी नारायण की शय्या बनाने वाला शेष नाग भी नारायण की ही शक्ति का एक रूप है । विष्णु के साथ राम कृष्ण दोनों अवतारों में लक्ष्मण और बलभद्र शेष के अवतार माने जाते हैं । योग दर्शन के सूत्रकार ऋषि पतञ्जलि को भी शेष का ही अवतार कहा जाता है, जिन्होंने शरीर के स्वास्थ्य के लिये चरक संहिता, व्याकरण की शुद्धि के लिये पाणिनि सूत्रों पर महाभाष्य और मनोनिरोध के लिये योग दर्शन की रचना की है । यहां उन शेष को विष्णु का ही एक नाम देकर नामांकित किया गया है ।
| अणुकारणवाद,<br>प्रधानकारणवाद<br>और विवर्तवाद | कणाद के वैशेषिक दर्शन और गौतम के न्याय दर्शन के मतानुसार सृष्टि का उपादान कारण परमाणु हैं, इसीलिये वे अणुवाद के समर्थक हैं। सांख्य और योग दर्शन सृष्टि का उपादान कारण मूल प्रकृति को मानते हैं । मूल प्रकृति को प्रधान और अव्यक्त भी कहते हैं, इसलिये सांख्य और योग दोनों प्रधान कारणवादी हैं, वे अणुवाद का खंडन करते हैं । प्रधान में |
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तीनों गुणों की साम्यावस्था रहती है। विषमावस्था में वह ही महत् तत्व कहलाता है, परन्तु वह आधुनिक वैज्ञानिकों की सृजन शक्ति (Cosmic-Energy) से सूक्ष्म तत्व है, क्योंकि मन और इंद्रियां भी उसी के विकार हैं। (Psychic Forces) अर्थात मानसिक शक्तियां भौतिक सृजन शक्ति (Cosmic-Energy) के विकार नही समझे जाते। वेदांत सृष्टि का आदि कारण ईश्वर की इच्छा शक्ति को मानता है और जड प्रधान कारणवाद और अणुवाद दोनों का खंडन करता है, परन्तु इस श्लोक में शंकर भगवत्पाद ने तीनों वादों का समन्वय करते हुवे वेदान्त के इच्छा शक्ति वाद का ही समर्थन किया है ।
'पांसु' अणुवाद की ओर संकेत करता है, 'चरण पंकेरुह' जड प्रधान कारणवाद की ओर, और 'तव' पद महा त्रिपुर सुन्दरी इच्छाशक्ति की ओर संकेत करता है । भगवती के चरणों को कमलों से उपमा दी गई है, कमल कीचड में उत्पन्न होता है, इसलिये उसको 'पंकेरुह'—अर्थात कीचड में उत्पन्न हुआ कहा गया है । यहां इच्छाशक्ति को तमोगुण की शक्ति होने के कारण, उसके घनीभूत होने पर जडावस्था में परिणत होने को पंक से उपमित किया है और उस घनीभूत तमोगुणी इच्छाशक्ति की स्थूल कीचड से जो कमल खिलते हैं, वे ही सद् और असद् विद्या-रूपी दो चरण है । उनकी धूल कमलों की रज है । रज तो बाहर से चरणों पर जम जाती है, परन्तु जैसे कमलों की पराग रूपी रज कमल से ही उत्पन्न होती है, वैसे ही यह पांसु कण भगवती के चरणों से उद्भूत है । अर्थात इच्छाशक्ति की स्थूल घनीभूत अवस्था प्रधान कारणवादियों
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का प्रधान है और वह ही परिणत होकर अणुओं का रूप धारण कर लेती है। आधुनिक विज्ञान वादियों के विद्युदाणुओं (Electrons) को सृष्टि का कारण मानें तो उनके केन्द्रीय (Protons) अणुओं को किसी जडशक्ति (Cosmic Energy) का अणुपरिणाम (granulation) मानना पडेगा, और उस सृजनशक्ति (Cosmic energy) को परमात्मा की आदि इच्छाशक्ति का परिणाम समझना चाहिये।
सर्व शक्तिमान की शक्ति का माप नहीं किया जा सकता, वह
| शेष और कुण्डलिनी | अनन्त है, और उसकी रचना में अनेक ब्रह्माण्ड हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के पृथक २ हरि, हर और ब्रह्मा हैं। प्रत्येक ब्रह्मा जितनी शक्ति अपने |
|---|
ब्रह्माण्ड को बनाने में खर्च करता है, वह सब अनन्तशक्ति का अति स्वल्प भाग है, अर्थात दो एक कण के ही तुल्य है। क्योंकि अनन्त वस्तु कभी सान्त (Limited) नही होती, यह बात प्रत्यक्ष देखने में आती है। एक वट के बीज में कितना बडा वृक्ष निहित है, इतना ही नहीं प्रत्येक बीज में अपने जैसे बीज असंख्यों की गिनती में बनाने की शक्ति रहती है। अर्थात प्रत्येक बीज में अनन्तशक्ति भरी हुई है। अणुबम का चमत्कारी प्रभाव अब सबको विदित है। न जाने एक-एक अणु से क्या-क्या हो सकता है। परमात्मा की अनन्त शक्ति, अणु-अणु में अनन्त ही परिपूर्ण है। अनन्त भण्डार से प्रवाहित शक्ति सक्रिय (dynamic) होकर अनन्त कार्य करके भी समाप्त नही होती, वरन अनन्त ही बच रहती है। यदि सब समाप्त हो जाय, तो वह अनंत पद वाच्य
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नहीं। ब्रह्माण्ड की रचना करके जो अनंत शक्ति बच रहती है, वह आणविक रूप धारण करने के लिये मानो कुण्डलों में घूमने लगती है और उसके कुण्डलाकृति रूपों के कारण उसको सर्प से उपमा दी जाती है। उसे अथर्व वेद में उच्छिष्ठ ब्रह्म कहा है। (देखें अथर्व वेदीय उच्छिष्ट सूक्त) और पुराणों में उसे ही नारायण की सेज बनाने वाला शेष (बचा हुआ) कहा है, उसको अनंत भी कहते हैं। उस शेष या उच्छिष्ट शक्ति का ब्रह्माण्ड के धारण करने में उपयोग होता है। मानो वह ब्रह्माण्ड को अपने हजार फणों पर धारण किये हुवे है। शेष शक्ति विश्व को धारण करती है इसलिये उसकी संक्षक और आधार होने के नाते विष्णु नारायण का ही रूप है।
‘सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः ।
सर्वेषां योगतंत्राणां तथाधारोहि कुण्डली ॥
**अर्थ—**जैसे सब पर्वत वनों को धारण करने वाले लोकों का आधार शेषनाग अहिराट् है, वैसे ही सब योगतन्त्रों का आधार कुण्डली (कुण्डलिनी शक्ति) है। पिण्ड शरीर की रचना के उपरांत जो शक्ति बच रहती है, वह मूलाधार में शरीर को धारण किये हुवे प्रसुप्तवत पडी रहती है, इसलिये उसको आधार शक्ति भी कहते हैं, उसी को कुण्डलिनी कहते हैं, यह ही शक्ति जाग कर प्रतिप्रसव क्रम का आरम्भ करती है और सब तत्त्वों को लयाभिमुख करती हुई शिव में लीन होने सुषुम्ना मार्ग से सहस्रार में चढने लगती है। मानों सब तत्वों को भस्म करके, शिवजी के अंग की विभूति बना देती है—यह लय क्रम मोक्ष मार्ग है—जैसा कि भस्म लगाने के मन्त्र में कहा जाता है—
सौंदर्य लहरी ६५
“ अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, व्योमेति भस्म, देवा भस्म, ऋषयो भस्म, सर्वे ह वा एतदिदं भस्म, भूतं पावनं नमामि सद्यः समस्ताध शासकम् ! ”
श्लोक में ‘पांसु’, ‘एनं’ शब्दों में एकवचन का प्रयोग किया गया है, न कि बहुवचन का । इसका अभिप्राय यह भी हो सकता है कि प्रत्येक अणु में भगवती के चरण हैं ।
वह है विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखी विश्वतोहस्ता उत विश्वतस्पात् ॥
अर्थात प्रत्येक परमाणु अनन्त शक्ति से परिपूर्ण है ।
तीसरे श्लोक में यह बताया गया है, कि भगवती की उपासना मुमुक्षुओं के अज्ञान का नाश करती है और सकाम उपासकों की सब कामनायें पूर्ण करती हैं । अर्थात भगवती भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है ।
[ ३ ]
अविद्यानामन्त स्तिमिर मिहिरोद्दीपन¹करी
जडानां चैतन्यस्तवकमकरन्दस्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्म जलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवती ॥
१. पाठान्तर:-( द्वीप नगरी )
६६ | सौंदर्य लहरी
कठिन शब्दों के अर्थ.- अन्तस्तिमिर=हृदय अथवा अन्तःकरण का अंधकार; मिहिर=सूर्य, चैतन्यंस्तवक=ज्ञानरूपी चेतन गुलदस्ता; स्रुति=स्रोत, प्रवाह; झरी=झरना; गुणनिका=माला; मुररिपुवराह=विष्णु का बाराहावतार ।
**अर्थः—**तू अविद्या में पडे हुओं को हृदयान्धकार को हटाने के लिये (ज्ञानरूपी) सूर्य का उद्दीपन करने वाली है, जड मनुष्यों के लिये चैतन्यस्तवक से निकलने वाले मकरन्द के स्रोतों का झरना है, दरिद्रियों के लिये चिन्तामणियों की माला है और जन्ममरण रूपी संसार सागर में डूबे हुओं को विष्णु भगवान के वाराहावतार के दांत के सदृश उद्धार करने वाली है ।
**सं० टि०—**शक्ति की उपासना से अज्ञान का नाश होता है, दरिद्रियों को धन मिलता है, जडता का नाश होता है और वह संसार सागर में डूबतों को सहारा है ।
विद्या और अविद्या
मुण्डकोपनिषद् में परा और अपरा नाम की दो प्रकार की विद्याओं का वर्णन है । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, और ज्योतिष सबको अपरा विद्या के अन्तर्गत माना गया है और जिस विद्या से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, उसे परा विद्या कहते हैं । अपरा विद्या के जानने वालों को विद्वान नहीं कहा जाता, क्योंकि वे अविद्या में ही पड़े रहते हैं । कर्मकांड और
सौन्दर्य लहरी १७
उसका सब विस्तार अविद्यामय ही है, उससे ब्रह्मप्राप्ति नहीं होती। ब्रह्मप्राप्ति के जिज्ञासु मुमुक्षु उसका परित्याग करके पराविद्या की शरण ग्रहण करते हैं और वे पराविद्या के अन्वेषक ही विद्वान कहलाने के योग्य हैं।
प्लवाह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ मु.(२.७)
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पंडितं मन्यमानाः ।
जंघन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथांधाः ॥८
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥९
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥१०
तपःश्रद्धे येह्युपवसंत्यरन्ये शांता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतःस पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११
अर्थः—ये १८ प्रकार के यज्ञायागादि अनुष्ठान अदृढ और अस्थिर हैं, और उनमें जो कर्म किये जाते हैं, वे श्रेय नहीं। जो मूढ इनको श्रेय समझ कर उनमें आनंदित होते हैं, वे जरामृत्यु में बार-बार आते हैं। अविद्या में पडे हुए, अपन को बुद्धिमान और पंडित मानने वाले, अंधों से ले जाये जाने वाले अंधों के सदृश वे मूढ जंघन्य हैं। अनेक प्रकार से अविद्या में पडे हुए वे बाल सदृश ऐसा कहते हैं कि हम कृतार्थ हैं। क्योंकि उनको कर्मों में राग रहने
६८ सौंदर्य लहरी
के कारण वैराग्य नहीं होता, उससे आतुर वे लोग क्षीणपुण्य होने पर स्वर्ग से गिरा दिये जाते हैं। इष्टापूर्त कर्मों को श्रेष्ठ मानने वाले वे मूढ यह समझते हैं कि उससे अन्य कोई श्रेय का मार्ग नहीं है। वे स्वर्ग में अपने पुण्यों को भोग कर इस लोक में अथवा इससे भी हीनतर लोकों में प्रवेश करते है। परन्तु जो तप और श्रद्धा से युक्त होकर वनों में रहते हैं, शांत हैं, विद्वान हैं और भिक्षा से जीवन निर्वाह करते हैं, वे निष्पाप होकर सूर्यद्वार (सुषुम्ना मार्ग) अथवा देवयान मार्ग से वहां जाते हैं, जहां वह अमर अविनाशी परम पुरुष मिलता है ।
यज्ञयागादि कर्मों के अनुष्ठान और कूपतडाग धर्मशाला इत्यादि का बनवाना, ऐसे इष्टापूर्त कर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, मोक्ष नहीं मिलती। स्वर्ग में अपने-अपने पुण्यार्जित भोगों के समाप्त होने पर वहां से उनको इस मर्त्यलोक में गिरा दिया जाता है । इसलिये सब सकाम अनुष्ठान और यज्ञों के कर्मकांड का विस्तार अविद्या कहलाता है। कर्मेष्ठी मनुष्य कर्म को ही मोक्ष का साधन जानते हैं और उनके अनुष्ठानों में आसक्ति के साथ लगे रहते हैं उनके हृदयों में अनेक कामनायें उठा करती हैं और भगवान के भजन और अनेक प्रकार के अनुष्ठानों के द्वारा अपनी कामनाओं की पूर्ति मांगा करते हैं। इस प्रकार मोहांधकार से उनका अन्तः करण अन्धकार मय रहता है, यद्यपि वे शास्त्रीय ज्ञान के धुरन्धर पंडित क्यों न हों। जब तक मन की वृत्तियां बहिर्मुखी रहती हैं, आत्मज्ञान का प्रकाश नहीं दिखता।
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कुण्डलिनी शक्ति जाग कर जब सुषुम्ना पथ में छओं चक्रों का बेध करती हुई सहस्रार में शिवसायुज्य पद पर आरूढ होने जाती है, तब प्रतिप्रसव क्रम द्वारा सब इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर देती है, मन के परों को काट डालती है, और बुद्धि को जगत के बहिर्चिन्तन से विश्रांति देने लगती है, और अन्तरात्मा रूपी सूर्य पर छाये हुए बादल एक-एक कर के विलीन होने लगते हैं । हृदयाकाश निर्मल और स्वच्छ हो जाता है और ज्ञान का प्रकाश अन्तराकाश में पूर्ण तेज से युक्त होकर चमकने लगता है । अविद्या का गाढ अन्धकार फट जाता है और अन्धेरे में बसेरा करने वाली बासना रूपी चिमगीदडों अथवा काम क्रोधादि उल्लूकों के ठहरने का कहीं स्थान नहीं रहता, और वे वहीं बैठे बैठे ज्ञान रूपी सूर्य के तेज से समाप्त हो जाते हैं । इसी अभिप्राय से शंकर भगवत्पद् कहते हैं कि भगवती अविद्यांधकार को नष्ट करने के लिये ज्ञानरूपी सूर्य का उद्दीपन करती है । दूसरा भाव यह भी है कि सूर्य मण्डल में अधोमुखी सूर्य शक्ति जागरण के पश्चात उन्मुख होकर अमृत का स्राव करने लगता है और परिणाम स्वरूप बहिर्विषयों की वासनायें स्वयं शांत हो जाती हैं । उसका फल यह होता है कि कर्मानुष्ठानों में रत, अविद्या के अन्धकार में पडे हुए कर्मकांडी बहिरनुष्ठानों का तिरस्कार कर के अन्तर्याग में लग जाते हैं । क्योंकि भगवती की चिन्मयी वाटिका के पुष्पों से प्रवाहित मधुर मकरन्द के स्रोतों के झरने जड लोगों की जडता को भी द्रवीभूत करने का सामर्थ्य रखते हैं । भगवती की चिन्मयी सत्ता ही तो नाना भेद रूपा सृष्टि के प्रभव काल में स्थूल सूक्ष्म जगत् का स्वांग भर लेती है, और प्रतिप्रसव क्रम के आरम्भ होने पर सब नाम
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रूपों को अपने में विलीन करती हुई शिव के निष्कल रूप से सायुज्यता का आलिंगन कर के स्वयं शिव स्वरूप हो जाती है । जीव की जडता पानी होकर बह जाती है और वह चैतन्य गंगा में स्नान करने लगता है ।
आत्मा असंग है, उसका जड प्रकृति अथवा उसके विकारों से तादात्म्य नहीं होता । स्थूल सूक्ष्म शरीर पर आत्मा की चेतना का प्रकाश अवश्य दृष्टिगोचर होता है, परन्तु आत्मा कभी शरीर नहीं बनता, वह सदा असंग है । देहाभिमान द्वारा केवल भ्रांति मात्र का स्फुरण हो उठा है कि मैं देह हूं । क्या चेतन स्वरूप आत्मदेव कभी जड देह बन सकता है ? यदि वह देह बन गया होता तो जागरण में अनुभव में आने वाला शारीरिक कष्ट स्वप्न में भी बना रहना चाहिये था, परन्तु वह ही एक आत्मा जागृत और स्वप्नावस्था के सुखदुःख अलग-अलग भोगता है, और गाढ निद्रा में सब छूट जाते हैं । तीनों अवस्थाओं का पृथक्-पृथक योग होने से उनके भोगों की अनुभूति भी पृथक २ होती है । स्वभाव से असंग आत्मा में कष्ट पीडा वेदनादि का सर्वथा अभाव है, परन्तु जब वह देह से संगी होता है उसको देह के धर्मों का भी भोग अनुभव गम्य होने लगता है । देहाध्यास ने मानो उसे अपने स्वरूप से गिराकर उसमें शरीर की जडता के अध्यारोपण की भ्रांति उत्पन्न कर दी है । देहाध्यास जितना दृढ होता जाता है, उतनी जडता की भी वृद्धि होती जाती है । मनुष्यों से पशुओं और पशुओं से उद्भिज्जों में अधिक जडता देखने में आती है । मनुष्यों में भी अन्तर होता है, कोई कोई थोडे से कष्ट से विह्वल हो उठते हैं, उनमें जडता अधिक
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है, और कोई कोई इतने तितिक्षु होते हैं कि महान कष्टों की भी परवाह नहीं करते, उनमें जडता कम समझनी चाहिये । शरीर के योग से ही आत्मा का स्वाभाविक आनन्द स्वरूप तिरोहित हो गया है । जितना मनुष्य देहवृत्ति का त्याग कर के आत्मस्थिति में ऊंचा उठ जाता है, उसे शारीरिक कष्ट उतना ही कम मन्ताप पहुंचाते हैं, और उसके आनन्दानुभव की वृद्धि होती है । कुण्डलिनी शक्ति जागकर पांचों तत्वों और मन का बेध कर के जड चेतन की ग्रंथियों को खोल देती है, तब साधक का देहाध्यास शिथिल हो जाने पर वह आत्मस्थिति की उच्च भूमिकाओं का अनुभव करने लगता है और आनन्द की लहरें उसकी प्रत्येक नाडी में प्रवाहित होने लगती हैं ।
चैतन्यस्तबक मकरन्दस्रुतिझरी का संकेत मधुप्रतीका भूमिका के लिये भी हो सकता है, जो ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने पर आती है । चैतन्य का अर्थ मंत्र-चैतन्य भी ग्रहण किया जा सकता है, उस पक्ष में श्री विद्या के मंत्र को स्तबक और मंत्र के अनुष्ठान द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से प्राप्त होने वाले दिव्यानन्दाबेश का प्रवाह मकरन्द के स्रोत की झरी से उपमित किया जा सकता है । मंत्र चैतन्य का लक्षण योगशिखोपनिषद् में इस प्रकार कहा गया है ।
यदानुध्यायते मंत्रं गात्रकंपोऽथ जायते । ७० ।
अर्थात् जब मंत्र का ध्यान किया जाता है, तब गात्रों में कंप का अनुभव होना चाहिये । कंप शक्ति के सक्रिय होने पर हुआ करते हैं, और उस कंप में दिव्यानन्द की लहरें प्रवाहित होती हुई
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अनुभव में आती हैं, जिससे सिर में आत्मानन्द की मस्ती प्रदान करने वाला नशा सा चढ जाता है । मंत्र चैतन्य का अर्थ मंत्रयोग द्वारा शक्ति का जागरण ही समझना चाहिये । कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर शरीर की जडता, आलस्य, भारीपन इत्यादि दोष तत्क्षण दूर हो जाते हैं। श्री विद्या के अक्षरों की चिन्तामणियों से और मंत्र की चिन्तामणियों की माला से भी उपमा दी जा सकती है । भगवती का अनुग्रह मुमुक्षुओं को मोक्ष देता है और सकाम उपासना करने वालों की अभीप्सित् कामनाओं को पूर्ण करता है, इसलिये कहा है कि भगवती दरिद्रियों के लिये चिन्तामणियों की माला के सदृश है । एक चिन्तामणि इन्द्र लोक में है जो कल्प वृक्ष के सदृश सब ही कामनाओं को पूर्ण करती है, परन्तु पंचदशी मंत्र में १५ और षोडशी में १६ अक्षर उतनी ही चिन्तामणियों के तुल्य हैं, जो उपासकों की सब ही कामनाए पूर्ण करते हैं ।
इस श्लोक से हादिविद्या का प्रथम कूट इस प्रकार उद्धृत किया जा सकता है । मिहिर से हकार, मकरंद की सोमसदृश उपमा से सकार, चिन्तामणि से सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला ककार और वराहावतार के महीउद्धार सदृश पृथिवी बीज का लकार और 'भगवती' पद से भगवती का साक्षात् हृल्लेखा अक्षर समझना चाहिये, एक कूट सिद्ध होने से पूरा मंत्र ग्रहण किया जा सकता है क्योंकि इस विद्या के तीनों कूट इन ही अक्षरों से बनते हैं । आगे चल कर श्लोक ३२ के नीचे यह दिखायेंगे कि शंकर भगवत्पाद् की इष्ट विद्या हादि विद्या ही थी । इसलिये इस श्लोक में भगवती के गुणानुवाद के साथ-साथ उस विद्या का रूप भी बता दिया गया