सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ५५
श्रुतियों में उसे समझाने के लिये अनेक प्रकार से चेष्टा की गई है। परन्तु सब श्रुतियों का अभिप्राय एक ही है। वह ईश्वर में उसके अधीन अव्यक्त अथवा व्यक्त दशामें सदा रहती है। शंकर भगवत्पाद 'तदधीनत्वादर्थवत्' (ब्र. १, ४, ३) और 'ज्योतिरूपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके', (ब्र. १, ४, ९) के भाष्य में इस बात को स्पष्ट करते हैं और उस शक्ति को दैवी शक्ति कहते हैं।
“यथा प्रकरणात्तु सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा नामरूपयोः प्रागवस्थानेनापि मंत्रेणाम्नायत”,
**अर्थ:—**प्रकरण के अनुसार तो वह ही दैवी शक्ति जो नाम रूप से विकृत नहीं है, नाम रूपों की पूर्व अवस्था के रूप में वेदोक्त मंत्र में कही गई है।
माया की अभिव्यक्ति, ईश्वर का ईक्षण अथवा संकल्प, ईश्वर का एजृत्व (एजृ कंपने) अर्थात स्पन्द सब सृष्टि के पूर्व में शक्ति के आन्दोलन के सूचकअर्थ पद हैं। यह कहना कठिन है कि पहिले इच्छा अर्थात ईक्षण हुवा अथवा पहिले संकल्प हुवा, अथवा पहिले स्पन्द हुआ। जिसने जैसा समझा वैसा ही वर्णन भिन्न-भिन्न प्रकार से उसने किया है। उपरोक्त नासदासीय सूक्त में पहिले तम (माया) फिर काम (संकल्प) फिर रेतस् (स्पंद) का क्रम मिलता है। परन्तु सर्वत्र यह ही क्रम नहीं दिखता। परन्तु इस बात में सब श्रुतियों का एक मत है कि चाहे वह माया हो, चाहे इच्छा, चाहे स्पन्द सब हैं एक ब्रह्म सम्बन्धी व्यापार ही। ब्रह्म की उस अवस्था को कहीं