भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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६४ | सौंदर्य लहरी

नहीं। ब्रह्माण्ड की रचना करके जो अनंत शक्ति बच रहती है, वह आणविक रूप धारण करने के लिये मानो कुण्डलों में घूमने लगती है और उसके कुण्डलाकृति रूपों के कारण उसको सर्प से उपमा दी जाती है। उसे अथर्व वेद में उच्छिष्ठ ब्रह्म कहा है। (देखें अथर्व वेदीय उच्छिष्ट सूक्त) और पुराणों में उसे ही नारायण की सेज बनाने वाला शेष (बचा हुआ) कहा है, उसको अनंत भी कहते हैं। उस शेष या उच्छिष्ट शक्ति का ब्रह्माण्ड के धारण करने में उपयोग होता है। मानो वह ब्रह्माण्ड को अपने हजार फणों पर धारण किये हुवे है। शेष शक्ति विश्व को धारण करती है इसलिये उसकी संक्षक और आधार होने के नाते विष्णु नारायण का ही रूप है।

‘सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः ।
सर्वेषां योगतंत्राणां तथाधारोहि कुण्डली ॥

**अर्थ—**जैसे सब पर्वत वनों को धारण करने वाले लोकों का आधार शेषनाग अहिराट् है, वैसे ही सब योगतन्त्रों का आधार कुण्डली (कुण्डलिनी शक्ति) है। पिण्ड शरीर की रचना के उपरांत जो शक्ति बच रहती है, वह मूलाधार में शरीर को धारण किये हुवे प्रसुप्तवत पडी रहती है, इसलिये उसको आधार शक्ति भी कहते हैं, उसी को कुण्डलिनी कहते हैं, यह ही शक्ति जाग कर प्रतिप्रसव क्रम का आरम्भ करती है और सब तत्त्वों को लयाभिमुख करती हुई शिव में लीन होने सुषुम्ना मार्ग से सहस्रार में चढने लगती है। मानों सब तत्वों को भस्म करके, शिवजी के अंग की विभूति बना देती है—यह लय क्रम मोक्ष मार्ग है—जैसा कि भस्म लगाने के मन्त्र में कहा जाता है—