सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी ५९
हकार से शिव और सकार से शक्ति का ग्रहण किया जाता है, जो महावाक्यों का मंत्रात्म स्वरूप है। सः जीव शक्ति है, और अहं का स्फुरण ब्रह्म की तेजोमयी अध्यात्म किरण है। हं शिव वाचक है, उसके पूर्व निषेधात्मक अकार लगा देने से उसकी जीव संज्ञा हो जाती है। इसलिये सःहं, अथवा सोहं का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए कि सःजीव शक्ति, हं शिव स्वरूप है। ह, स. अथवा हंसः का अर्थ इसी प्रकार यह होता है कि शिव ही जीव बन गया है। इस प्रकार शिव तत्व का अहं वृत्ति के आधार पर तत्वानुसंधान करते-करते निषेधात्मक अकार का त्याग करके ब्रह्मलीनता प्राप्त करने के इस साधन क्रम को, अहंग्रह उपासना कहते हैं।
श्री विद्या गायत्री का भी तांत्रिक रूप समझा जाता है। वह निर्गुण ब्रह्म जगत का आदिकारण सविता अर्थात प्रसूता, जन्मदाता वरण करने के योग्य है, यह बात गायत्री के प्रथम पाद में कही गई है। वह ध्यान का विषय न होने के कारण वरेण्यम् है, ध्येयं नहीं, इसलिये उसकी तेजोमयी सत्ता 'भर्गस' का ही ध्यान संभव है। यह बात दूसरे पाद में कही गई है। बुद्धि ध्यान का यंत्र है, वह ध्यान द्वारा ब्रह्म में तल्लीनता होने को प्रवृत्त होनी चाहिये। इसलिये प्राणस्वरूप रुद्र की सहायता से उस पद की उपलब्धि की जिज्ञासा तीसरे पद में दिखाई गई है। गायत्री मंत्र का श्री विद्या से सम्बन्ध इसी विचार धारा से सिद्ध होता है। देखें त्रिपुरातापिन्युपनिषद् ।
ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी ने भी श्री विद्या की उपासना की थी और उनके उपास्य मंत्र क्रमशः ब्राह्मी, वैष्णवी और शांकरी विद्याओं के नाम से प्रसिद्ध है।