स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजपा-गायत्री और विशेष स्पन्द ९९ की उत्पत्ति, मानने के नियमों में सीमित कर देता है। 'किसी १विशिष्ट कारण से कोई विशिष्ट कार्य होगा या अमुक विशिष्ट कार्य का अमुक विशिष्ट कारण था'—इस प्रकार के संकोचों में पड़ा हुआ जीव, प्रतिसमय, विशिष्ट कार्यों और कारणों को जन्मभर ढूँढ़ता हुआ ही काल-कवलित हो जाता है। जन्मभर स्वार्थ को ही सर्वोपरि मान्यता देकर, २नियत कारणों से नियत अर्थक्रिया की सिद्धि चाहता हुआ पशु, नियत वस्तुओं का ही उपादान करता रहता है और इतरों को छोड़ता रहता है। ऐसी भावनायें उसकी अव्यापकता को सूचित कर देती हैं। यही कारण है कि नियति को दूसरे शब्दों में 'अव्यापकता' भी कहते हैं। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित तालिका को ध्यान में रखें— स्वातन्त्र्यशक्ति | मायातत्त्व | संकोचहीन शिव की अभिन्न स्वातन्त्र्य शक्ति के पांच मुख | संकुचित पशुभाव को जन्म देने वाली भेदपूर्ण माया के पांच मुख | | चित् — सर्वज्ञता | विद्या — अल्पज्ञता | | निर्वृति — सर्वकर्तृता | कला³ — अल्पकर्तृता | | इच्छा — पूर्णता | राग — अपूर्णता | | ज्ञान — नित्यता | काल — अनित्यता | | क्रिया — व्यापकता | नियति — अव्यापकता | मायातत्त्व और उसके विकासरूप उपरिलिखित पांच तत्त्वों को मिला कर शैव शब्दों में, षट्-कञ्चुक कहते हैं। यह मौलिक अन्तरंग ४आवरण है क्योंकि यह पूर्णसंवित् को आच्छा- दित करके, उसके साथ ऐसा चिपका रहता है कि चावल के दाने के साथ चिपके हुये ऊपरी छिलके की तरह ५व्यतिरिक्त होने पर भी अव्यतिरिक्त जैसा लगता है। इसके प्रतिकूल देह, प्राण, पुर्यष्टक, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां इत्यादिकों को बहिरङ्ग आवरण कहा जाता है। इन ६वेद्यभूत आवरणों के द्वारा आच्छादित ज्ञान-क्रियारूप संवेदन अर्थात् चेतन-प्रमाता, मूलतः १. नियतिर्योजनां धत्ते विशिष्टे कार्यमण्डले । (तं०, ९. २०२) २. नियतामर्थक्रियामर्थयता नियतमेव वस्तु उपादातव्यम् । (तं० वि०, ९. २०२) ३. तालिका में कला को विद्या के पश्चात् लिखा गया है इससे पाठकों को किसी सैद्धान्तिक मतभेद की कल्पना नहीं करनी चाहिये। हो सके तो अधिक स्पष्टीकरण के लिए 'तन्त्रालोक' नवम आह्निक का अध्ययन करें। ४. मायासहितं कञ्चुकषट्कमणोरन्तरङ्गमिदमुक्तम् । (प० सा० १७) ५. तथा एतत् मायादिकञ्चुकम् अणोः तण्डुलस्थानीयस्य अन्तरङ्गत्वात् कम्बुकस्थानीयं व्यति- रिक्तमपि अव्यतिरिक्ततया पूर्णसंवित्स्वरूपम् आच्छाद्य स्थितम् । (प० सा० वि० १८) ६. देहपुर्यष्टकाद्येषु वेद्येषु किल वेदनम् । एतत्षट्कप्रपञ्चोऽयं प्रत्यपादि प्रसङ्गतः (तं० ९. २०५)