भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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१०० स्पन्दकारिका वेदक होने पर भी, स्वरूप संकोच की दशा में (शक्तिदरिद्रता की दशा में) पड़ जाने के कारण अणु अर्थात् संसारी जीव बना हुआ है और इसको शास्त्रीय शब्दों में 'पुरुष-तत्त्व' कहा जाता है। इस प्रकार के विश्लेषण से प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित सिद्धान्त सरलता से समझ में आ सकता है कि बहिर्मुखीन संसारभाव की ओर अजस्ररूप में प्रवहमान, गुणादि-स्पन्दों के निष्पन्द अथवा दूसरे शब्दों में अपनी ही शक्तियों की दरिद्रता, संसार के अपरिपक्व बुद्धि वाले व्यक्तियों को, अपनी वास्तविक स्थिति की अनुभूति प्राप्त करने में बाधा उपस्थित कर देती है। उपरिलिखित रागतत्त्व के विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु पाठकों को निम्नलिखित बातें भी ध्यान में रखने का प्रयत्न करना चाहिये। यद्यपि ये बातें कुछ मात्रा तक अप्राकरणिक भी सिद्ध हो सकती हैं परन्तु आत्म-अन्वेषण के मार्ग में प्राकरणिकता या अप्राकरणिकता की सीमाओं का वशवर्ती बनना भी ठीक नहीं है। शैवदार्शनिकों का विचार है कि पूर्वोक्त आणवमल ही राग का मूल उद्गमस्थान है। संवित्-भट्टारिका में भी, विश्वरूप में उच्छलित होने का आन्तर-अभिलाष वर्तमान है। यह बात अलग है कि उस अवर्ण्य स्तर पर वर्तमान अभिलाषा को क्षुद्र पशुओं में वर्तमान क्षुद्र अभिलाषा की संज्ञा नहीं दी जा सकती है परन्तु अभिलाषा तो अभिलाषा ही है क्योंकि उसी ने सर्वस्वतन्त्र संवित् को पृथिवीतत्त्व तक की निकृष्ट कोटि पर अवरूढ़ होने के लिये विवश किया है। संसार-भाव के स्तर पर अवस्थित पशुओं में भी यही आणवमल पहले सूक्ष्मातिसूक्ष्म १लोलिका के रूप में प्रकट हो जाता है। शैवग्रन्थों में 'लोलिका' अभिलाषा के उस सूक्ष्माति- सूक्ष्म रूप को कहते हैं जिसमें अभिलषणीय विषय की स्पष्टता तो नहीं होती है परन्तु मन में अपूर्णता की अनुभूति से जन्य सिहरन जैसी होती है। यह एक प्रकार की निष्कर्म अभिलाषा है और पशु के मन में—'मुझे कुछ चाहिये' इस प्रकार की जैसी अस्पष्ट आकांक्षा की अनुभूति को जन्म देती है। यह लोलिका ही परिपुष्ट होकर और चतुर्दिक क्षोभ में पड़कर, कर्मसहित स्थूल अभिलाषा का रूप धारण कर लेती है और इस रूप में इसको बुद्धि का धर्म बना हुआ 'राग-तत्त्व' कहते हैं ॥२०॥ [ निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता ] परमकारुणिक गुरु अगले सूत्र में यह परामर्श देते हैं कि आत्मा का उद्धार चाहने वाले व्यक्तियों को अपने आप ही स्पन्दशक्ति की अनुभूति प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयत्न- शील बनना चाहिये। निरन्तर उद्योग करने से इच्छापूर्ति होने में अधिक समय नहीं लगता है:— १. अणूनां लोलिका नाम निष्कर्मा याभिलाषिता अपूर्णम्मन्यताज्ञानं मलं सावच्छिदोज्झिता ।। (तं०, ९.६२)