भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता १०१ अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये। जाग्रदेव निजं भावं न चिरेणाधिगच्छति ॥२१॥ अतः सततं सर्वकालं यः करोत्युद्योगं स्पन्दतत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थं, स जाग्रदवस्थायामेव निजमात्मीयं तुर्यभोगाख्यं स्वभावम् अचिरेणैव कालेन प्राप्नोति ॥२१॥ अनुवाद सूत्र—इस पूर्वोक्त कारण को दृष्टिपथ में रखकर, जो कोई (प्रबुद्ध भूमिका पर अव- स्थित योगी), अपने आप में स्पन्द-तत्त्व को अभिव्यक्ति के लिये, प्रतिसमय अथक प्रयत्न करता रहता है, उसको जाग्रत्-अवस्था में ही अपने चिन्मात्र भाव की उपलब्धि, अति अल्प समय में हो जाती है ॥२१॥ वृत्ति—अतः जो कोई (प्रबुद्ध योगी) अपने में, स्पन्दतत्त्व के स्वरूप की अनुभूति प्राप्त करने के लिये, प्रतिसमय उद्योग करता रहता है, वह जाग्रत्-अवस्था में ही, अपने भाव अर्थात् तुर्यचमत्कारमय स्पन्द-तत्त्व की अनुभूति, अति अल्प समय में प्राप्त कर लेता है ॥२१॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में उन व्यक्तियों को प्रतिसमय प्रयत्नशील रहने का उपदेश दिया गया है जो स्पन्दात्मक परसंवित्-धाम में प्रवेश पाने के इच्छुक हों। इस सम्बन्ध में मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि प्रयत्न किस बात का करना है ? भगवान् चन्द्रमौलि ने— 'प्रयत्नः साधकः' (शिवसूत्र, २.२) इस सूत्र में, दो ही शब्दों में, शङ्कानिवारण किया है। शास्त्रकारों ने बहुत विस्तार से भगवान् के इस सूत्र में अन्तर्निहित अभिप्राय का विश्लेषण किया है। संक्षेप में उसका अभिप्राय इस प्रकार है:— बहिर्मुखीन विश्वप्रसार की ओर लगातार गुणादि रूपों में प्रवाहमान स्पन्द-प्रवाहों का रूप चित्त है। पाञ्चभौतिक काया में रहते रहते केवल १चित्त के द्वारा ही परतत्त्व का अनुसन्धान किया जाता है ! अतः मननधर्मा होने के कारण वास्तव में चित्त को ही मन्त्र की संज्ञा दी गई है। त्रिगुणमय होने के कारण चित्त में प्रतिसमय संकल्प-विकल्प उठते और बैठते ही रहते हैं। इसी संकल्प-विकल्पात्मक चित्त को धीरे धीरे आन्तरिक अनुसन्धान अर्थात् सद्विमर्श के बल से सामान्य-स्पन्दरूप पर-प्रतिभा अर्थात् विकल्पहीन परसंवित्-धाम में निलीन करने के अकृत्रिम प्रयास को पारिभाषिक शब्दों मे 'प्रयत्न' कहते हैं। भगवान् ने सूत्र में ऐसे ही प्रयत्न को करते रहने का आदेश दिया गया है क्योंकि यही अन्ततोगत्वा, योगी के हृदय में शाक्तस्वरूप की अभिव्यक्ति कर देता है। सहज प्रयत्न के द्वारा पूर्ण अहंद्रूप आत्म-अनुभूति १. 'चित्तं मन्त्रः' चेत्यते विमृश्यते अनेन परम् तत्त्वम् इति चित्तम्••••तदेव मन्त्र्यते गुप्तम् अन्तरभेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन इति कृत्वा मन्त्रः ॥ (शिवसूत्र वि०, २.१)