भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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१०२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri प्राप्त करने को ही शास्त्रीय शब्दों में मन्त्रवीर्य की अनुभूति प्राप्त करना कहते हैं क्योंकि पूर्ण-अहंभाव की अनुभूति ही सर्वोत्कृष्ट वीर्य है । आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए अपेक्षित प्रयत्न या उद्योग का स्वरूप समझने के साथ ही, मन में, इसे प्रयत्न की क्रियान्वित करने की प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा का उत्पन्न होना भी स्वाभाविक ही है । शास्त्रकारों ने शाक्तभूमिका की अनुभूति प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है परन्तु भगवान् अभिनवगुप्त ने इस विषय में, 'विकल्पसंस्कार'¹ की प्रक्रिया को ही सर्वप्रथम मान्यता प्रदान की है । आत्मिक उन्नति के मार्ग में 'विकल्प-संस्कार' अर्थात् अपनी भावनाओं का परिष्कार करना ही प्रयत्न की मुख्य प्रक्रिया है और कम से कम, आधुनिक युग की शतशः उलझनों से भरे हुये व्यस्त जीवन में इसी का कार्यान्वयन भी संभव हो सकता है । आध्यात्मिक पक्ष में ही नहीं, अपितु साधारण जीवनपक्ष में भी इस प्रक्रिया को अपनाने से प्रत्येक मानव का और उसके द्वारा सारे जगत् का श्रेय हो सकता है । विकल्पों का संस्कार किस प्रकार हो सकता है—इस विषय में गुरुओं का कथन है कि बार बार कामिनी-कांचनरूप प्रतिकूल दिशा में प्रवहमान विकल्पों की परम्परा का मार्ग बदलकर, बलपूर्वक, स्वरूप-चिन्तन की अनुकूल दिशा में लगाने से स्वयं ही विकल्पों का संस्कार हो जाता है । पहले इस बात का उल्लेख हो चुका है कि गुणादि-स्पन्दों के निःष्यन्द प्रतिक्षण आत्मा के वास्तविक रूप पर आवरण डालते रहते हैं । यही कारण है कि मानसिक विकल्प प्रतिक्षण मायीय एवं निहित स्वार्थों की पूर्ति करने पर ही कटिबद्ध रहते हैं । बुरे विकल्पों के संस्कार और भी शतगुण बुरे ही विकल्पों की परम्पराओं को जन्म देते हैं । फलतः सांसारिक विषयोपभोगों की श्रृंखलायें इस प्रकार उलझ जाती है कि जन्म-जन्मान्तरों तक चित्त की स्थिरता प्राप्त करना स्वप्न बन जाता है । अतः प्रबुद्ध व्यक्तियों को खाते, पीते, सोते, जागते अर्थात् जीवन का प्रत्येक कार्य-कलाप करते करते ही इन्द्रियों की सरणियों से बाहरी हेय-विषयों की ओर दौड़ने वाली विकल्प-परम्पराओं को, अलंग्रास की युक्ति से ग्रस्त करके, अर्थात् सत्-विमर्श के बल से बाह्य-विषयों से निवृत्त करके, हृदय में अर्थात् चित्प्रकाशमय संवित्-धाम में, एकाग्रभाव से लगाने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिये । ऐसा करने से मन में संस्कृत (परिष्कृत) विकल्प ही उठने लगते हैं, संस्कृत विकल्पों के संस्कार शतगुण संस्कृत विकल्पों को ही ²जन्म देते रहते हैं और असत् विकल्प स्वयं ही क्षीण होते रहते हैं । सावधान रहकर लगातार अभ्यास करते रहने से विकल्प संस्कृत होकर संस्कार की पूर्ण परिणति की अवस्था पर पहुँच जाते हैं । पूर्ण-संस्कृत विकल्प का शास्त्रीय नाम 'स्फुटतम १. ..............................स्वभावे पारमेश्वरे । प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात् संस्कारमञ्जसा ॥ (तं०, ४.३) २. विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्वात्मसंस्कृतम् । स्वतुल्यं सोऽपि सौन्दर्य्यात्सौन्दर्यं सदृशात्मकम् । (तं०, ४.२)