भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 190 में से

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जाग्रत् में स्पन्दतत्त्व का अनुभूति १०५ अनुवाद सूत्र—सहसा क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ अथवा हर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ अथवा ( किसी अतर्कित कारण से )—'मैं क्या करूँ ?' इस प्रकार की किंकर्तव्य- विमूढ़ता की अवस्था में पड़ा हुआ अथवा अकस्मात् दौड़ पड़ने के लिए विवश बना हुआ व्यक्ति, जिस अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है, उसी में प्रतिष्ठित स्पन्दतत्त्व की उपलब्धि हो जाती है ॥ २२ ॥ वृत्ति—अत्यन्त क्रोधी होने, हर्ष में पड़ने, अकस्मात् दौड़ पड़ने और (किसी समय अकस्मात्)—'मैं क्या करू ?' इस प्रकार की चिन्ता में पड़ जाने पर, जब किसी व्यक्ति के अन्तस् में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उदय हो जाता है, तब (उस क्षणिक अवधान में) स्पन्द-तत्त्व का स्पष्ट-रूप में उदय हो जाता है। उसकी अनुभूति गुरु के उपदेश से प्राप्त कर लेनी चाहिये ॥२२॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में अन्तर्निहित ध्वनि को अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिये, सूत्र की वृत्ति में प्रयुक्त 'शक्तिप्रत्यस्तमितदशा' शब्द का तात्पर्य समझना अत्यावश्यक है। जीवभाव के साथ सम्बन्ध रखने वाले दैनिक आदान-प्रदान में, कभी कभी ऐसे भी क्षण आते हैं कि उन मनोभावों के रूप में बाहर की ओर प्रवहमानविशेष स्पन्दों के प्रवाहों में, सहसा किसी अतर्कित कारण से, पलभर के लिए गतिनिरोध की अवस्था उभर आती है। विशेष रूप में प्रवहमान शक्ति की इस गतिनिरोधात्मक अवस्था को 'शक्तिप्रत्यस्तमितदशा', 'वृत्तिक्षयदशा', 'निस्ति- मितबुद्धिदशा' इत्यादि शास्त्रीय शब्दों के द्वारा अभिहित किया जाता है। इस सम्बन्ध में यह बात विशेषरूप में स्मरणीय है कि शक्तिप्रत्यस्तमितदशा के क्षणों पर शक्ति की प्रवहमानता कदापि रुकती तो नहीं है अपितु होता यह है कि इसकी बहिर्मुखीन प्रवहमानता सहसा दिशा बदलकर क्षणभर के लिए अन्तर्मुखीन हो जाती है और इतने ही स्थूल बुद्धि के द्वारा अग्राह्य, कालखण्ड में विद्युत् की तरह अत्यन्त तीव्र गति से, मौलिक सामान्यरूपता के साथ एकाकार होकर फिर विशेष रूप में प्रवाहित होने लगती है। कहने का तात्पर्य यह कि शाक्त-स्फुरणा किसी भी रूप में रुकती नहीं है क्योंकि स्फुरणा एक अविराम गतिशीलता है। जाग्रत्-अवस्था में सामान्य-स्पन्दतत्त्व का अनुभव ऐसे ही 'शक्तिप्रत्यस्तमित' क्षणों पर हो सकता है क्योंकि इन क्षणों पर विशेष-स्पन्दों का क्षोभ पूर्णतया शान्त हुआ होता है। वस्तुस्थिति इस प्रकार है कि जब किसी व्यक्ति के मन में क्रोध, हर्ष, भय या अन्य कोई मनोभाव, अपने अनुकूल १आलम्बन के साथ सामना होने की दशा में, अकस्मात् अतिस्वनिक १. प्रत्येक मनोभाव का अपना कोई निश्चित आलम्बन अर्थात् आश्रय होता है। विविध प्रकार के आलम्बनों के अवलम्बन से विविध प्रकार के मनोभाव उभर आते हैं। उदाहरण के तौर पर अकस्मात् प्राणघातक शत्रु को देखकर क्रोध, प्राणों से भी प्रिय इष्टजन को चिरकाल के अनन्तर देखकर हर्ष, अपने स्वामी की कठोर एवं जोखिम भरी आज्ञा को