स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ स्पन्दकारिका वेग से उभर आता है तब उसके मन पर इसकी एक विलक्षण प्रतिक्रिया हो जाती है । वह यह कि जितनी अलक्ष्य तीव्रता से उभर आनेवाला भाव उभर आता है, उतनी ही तीव्रगति से उसका पूर्ववर्ती मनोभाव डूब जाता है । इन दोनों मनोभावों के ऐसे अप्रत्याशित अन्त एवं आरम्भ के बीचवाले संधिक्षण में सारी विशेषरूप मानसिक वृत्तियों की बहिर्मुखीन गति स्तब्ध हो जाती है । दूसरे शब्दों में यह क्षण एक प्रकार का निर्विकल्प क्षण जैसा होता है और इसमें बिजली की तीव्रतम कौंध की तरह, अलक्षित रूप में, विगलित-वेद्यान्तरता अपनी झलक दिखाकर फिर शान्त हो जाती है । सुखिता, दुःखिता या मूढ़ता इत्यादि अन्तःकरणवृत्तियों की चेतना का नाममात्र भी अवशिष्ट नहीं रहता है और फलस्वरूप इस क्षण में केवल सामान्य स्पन्द-तत्त्व की प्रकाशमानता ही अवशिष्ट रह जाती है । प्रत्येक जीव की मानसिक प्रक्रिया में, प्रतिसमय न जाने कितने ऐसे शक्तिप्रत्यस्तमित दशा के क्षण आते-जाते रहते हैं क्योंकि प्रतिक्षण मनोभावों की उन्मज्जन और निमज्जन की क्रिया अविराम गति से चलती रहती है । कठिनता तो यह है कि मनोभावों का उन्मज्जन और निमज्जन इतना तीव्र होता है कि साधारण रूप में किसी मनुष्य को भी—मानवेतर प्राणियों की तो बात ही नहीं—इस बीच वाले सन्धिक्षण का आभास भी नहीं मिलता है । इसका कारण यह कि यह क्षण अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण स्थूल-बुद्धि के द्वारा ग्राह्य नहीं है । जिन भाग्यशाली व्यक्तियों पर परमेश्वर का तीव्रतम शक्तिपात हो उनको सद्गुरु लोकोत्तर प्रातिभ-ज्ञान के द्वारा, इन अन्तरालवर्ती सन्धिक्षणों और इनमें प्रकाशमान रहने वाले स्पन्दतत्त्व की अनुभूति करवा लेते हैं । अनन्तर वे अभ्यास की दृढ़ता से, ऐसे ही क्षणों पर, अपनी बहिर्मुखीन शक्ति को कूर्मांग-२संकोच की युक्ति से एकदम समेट कर, अन्तर्मुख हो जाते हैं और धीरे धीरे इस भाव पर स्थिर रहने की क्षमता भी प्राप्त कर लेते हैं । प्रस्तुत सूत्र में हर्ष, क्रोध और मूढ़ता इनसे क्रमशः सारी सुखात्मक, दुःखात्मक और मोहात्मक अन्तःकरणवृत्तियों का ग्रहण करके, सारी ज्ञानेन्द्रियों की व्यापाररूपा जाग्रत्-अवस्था सुनकर किंकर्तव्यविमूढ़ता अथवा जंगल के सुनसान मार्ग में चलते समय अचानक सामने आते हुये शेर या फनियाले को देख कर भय का भाव उभर आता है । इसी प्रकार अन्य मनोभावों के विषय में समझना चाहिये । १. क्षुताद्यन्ते भये शोके गह्वरे वा रणद्रुते । कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥ (वि० भै०, ११९) इस विषय में वि० भै० ७१-१०१ और शि० दृ० १.९-११ भी द्रष्टव्य हैं । २. जिस प्रकार कछुआ भय की खनक पाते ही, पलक भर में, अपने सारे अंगों को अपनी ही पीठ पर वर्तमान कटाह के नीचे समेट लेता है । 'प्रसृताया अपि वा कूर्माङ्गसंकोचवत् त्राससमये हृत्प्रवेशवच्च सर्वतो निवर्तनम्' । (मा० वि० वा० १८)