स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य १०७ में और दौड़ने की क्रिया के द्वारा सारी बहिरंग कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण करके कर्मे- न्द्रियों की व्यापकरूपा जाग्रत्-अवस्था में, समान रूप से स्पन्द-तत्त्व की उपलब्धि की ओर संकेत किया गया है ॥२२॥ [ चित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य ] यहाँ तक के प्रकरण में जिस प्रकार का वर्णन किया गया है उस प्रकार की अनुभूति प्राप्त करवाने में, शिष्य पर सद्गुरु की छत्रच्छाया का होना अनिवार्य है । परन्तु जिस समय कोई साधक स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका में वास्तविक प्रवेश कर लेता है उस समय से सत्-गुरु का साथ भी छूट जाता है । इसका कारण यह कि तुर्यधाम में प्रविष्ट होने के समय तक विकल्पों का इतना संस्करण हुआ होता है कि गुरुभाव और शिष्यभाव का विकल्प भी समाप्त हुआ होता है । फलतः यहाँ से आगे का क्षेत्र पार करने में, साधक की, अपनी उद्-बुद्ध शक्ति ही पथप्रदर्शिका बन जाती है । अगले तीन¹ सूत्रों में, ऐसे ही, शाक्त-भूमिका में प्रविष्ट होने के बिल्कुल अभिमुख योगी की, मानसिक संकल्प-बद्धता, यौगिक प्रक्रिया और सुषुम्नाधाम में अन्तिम लयीभवन का वर्णन किया जा रहा है— यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति । तदवश्यं करिष्येऽहमिति सङ्कल्प्य तिष्ठति ॥२३॥ तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि । सौषुम्नेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम् ॥२४॥ तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥२५॥ यां स्पन्दस्वरूपरूपामस्थामवलम्ब्य 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं करिष्यामि' इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥२३॥ तस्य, तामवस्थामाश्रित्य पुरुषस्य, सोमसूर्यो द्वावपि सौषुम्ने अध्वनि मध्यनाड्य- भिधाने, अस्तमयं कुरुतः, ब्रह्माण्डगोचरं शरीरमार्गं परित्यज्य योगिनः ॥२४॥ तस्मिन् महाव्योम्नि प्रत्यस्तमित-शशिभास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्तिः न सम्यक् वृत्ता, स स्वप्नादिना मुह्यमानोऽप्रबुद्धो निरुद्धः स्यात्, प्रबुद्धः पुनरनावृत एव भवति ॥२५॥ अनुवाद—(सूत्र २३ दृष्टान्त के रूप में) सूत्र—(साधारण जीवभाव के स्तर पर, जिस प्रकार किसी महान् गौरवशाली और सहानुभूति से पूर्ण हृदय वाले स्वामी का परिचारक, उसकी कोई आवश्यक आज्ञा सुनने के पूर्ववर्ती क्षण में—) १. इन तीनों सूत्रों में से पहला सूत्र दृष्टान्त और दार्शनिक दोनों रूपों में प्रस्तुत हुआ है।