भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 118

१०८ स्पन्दकारिका 'यह मेरा स्वामी जो कोई भी (साध्य या दुस्साध्य) कार्य करने की आज्ञा देगा, वह मैं अवश्य उसी यथावत् रूप में करके ही रहूँगा' इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर, जिस प्रकार की मानसिक अवस्था (वृत्तिप्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है— (दार्ष्टान्तिक के रूप में) (उसी प्रकार साधना के क्षेत्र में कोई भी प्रबुद्ध-भूमिका पर अवस्थित साधक) 'यह स्पन्दात्मिका शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शात्मक अनुभूति करायेगी, मैं उस पर आरूढ होकर रहूँगा'—इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर जिस प्रकार की मानसिक अवस्था (वृत्तित्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है ॥२३॥ उस योगी की उसी अवस्था का आश्रय लेकर, उसके चन्द्रमा और सूर्य (मनस् एवं प्राण अथवा प्राण एवं अपान) शरीर व्याप्ति को छोड़कर, ऊर्ध्व-मार्ग से सुषुम्नाधाम में पहुँचकर, उसी में लय हो जाते हैं ॥२४॥ जहाँ पहुँचकर चन्द्रमा और सूर्य दोनों ही लीन हो जाते हैं उस महान् आकाश में (तुर्यरूप शाक्तभूमिका के अनन्त आकाश में) प्रबुद्ध योगी की चिन्मात्ररूप अनुभूति पर कोई भी आवरण नहीं रहता है । इसके प्रतिकूल मूढ अर्थात् सम्यक्-अनुभूति से हीन योगी, उस अवस्था में भी, सुषुप्ति१-पद की जैसी प्रगाढ़ अन्धतमस् की दशा में अचेत पड़ा रहता है ॥२५॥ वृत्ति—(तुर्यरूप शाक्तभूमिका में प्रविष्ट होने के अभिमुखीभाव के अवसर पर) जो योगी—'यह मेरी स्वभावभूत स्पन्द-शक्ति 'मुझे जो कुछ भी कहेगी अर्थात् तुर्या भूमिका में प्रविष्ट होने के लिए जैसा भी पथप्रदर्शन करेगी, मैं अवश्य उसी का अनुसरण करूँगा' इस प्रकार का अटल संकल्प धारण करके, स्पन्दतत्त्व का स्वरूप ही बनी हुई अवस्था का आश्रय लेकर, स्पन्दतत्त्व पर अधिष्ठित होकर रहता है— उस योगी की उसी अवस्था के आधार पर, उसके चन्द्रमा और सूर्य दोनों, शरीर व्याप्ति को छोड़कर अर्थात् पाञ्चभौतिक काया में अपने बहिर्मुखोन प्रसार को छोड़कर, 'मध्य- नाड़ी' नामवाले सुषुम्नामार्ग में लय हो जाते हैं । जिसमें चन्द्रमा और सूर्य दोनों का अस्तमन हो जाता है उस महान् आकाश में अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप तुर्या भूमिका के असीम आकाश में, ऐसा योगी जिसको पूर्णरूप से स्वभाव की अभिव्यक्ति न हुई हो, साधारण स्वप्न इत्यादि (लौकिक स्वप्न और सुषुप्ति) के द्वारा मूढभाव (तामसिक मोह) में डाला जाने के कारण, अप्रबुद्ध बनकर२ निरुद्ध अवस्था में पड़ा रहता है । इसके प्रतिकूल प्रबुद्ध योगी की आत्मचेतना निरावृत रूप में प्रकाशमान रहती है ॥२३-२५॥ १. यहाँ पर सुषुप्ति-पद से योगी की उस अवस्था का अभिप्राय है जिसमें उसको आत्म- साक्षात्कार हो जाने पर भी उसकी चेतना नहीं रहती है । २. चित्त की ऐसी अवस्था जिसमें वह अपनी मौलिक चितिरूपता का साक्षात्कार करने के क्षण पर मूढता (मोहग्रस्तता अथवा तमोऽभिभव) के कारण,