स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्तवृत्ति एकाग्रता—सोमसूर्य १०९ विवरण प्रस्तुत सूत्र (सूत्र २३) में विशेषस्पन्द कही जाने वाली बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों की निरोधात्मक प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों को, अलंग्रासयुक्ति के द्वारा दिशा बदलकर, अन्तर्मुखीन बनाना ही 'चित्तनिरोध' है और यही शाक्त-उपाय का आधार-स्तम्भ है। इस विषय में पहले भी पर्याप्त उल्लेख हो चुका है अतः उन बातों को फिर दोहराने की आवश्यकता नहीं है। यहां पर केवल इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि इस सूत्र में, एक कर्मचारी (जो अन्य सारे कर्त्तव्यों को भूलकर प्राणपन से अपने हितैषी स्वामी की आज्ञा को पूर्ण करने पर उद्यत हो) की क्षणपर्यवसायिनी वृत्तिप्रत्यस्तमितदशा के दृष्टान्त की पृष्ठभूमि पर, इस बात का स्पष्ट संकेत किया गया है कि, स्पन्दमयी शाक्तभूमिका में प्रवेश पाने के प्रति उत्सुक योगी को, पहले अपने में प्रखर मानसिक नियन्त्रण की क्षमता प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये संकल्प की दृढ़ता, सद्विचार, अटल श्रद्धा और आत्म-शक्ति की तीव्रता परम अपेक्षित अंग हैं। दृढ़संकल्प वाला योगी ही, स्वरूप-की उपलब्धि के लिए सांसारिक बाधाओं एवं तथाकथित विभीषिकाओं को अपनी शक्ति से परास्त कर सकता है, अन्यथा नहीं। भारतीय जनगण के मानविहारी भगवान् मुरलीमनोहर ने 'चित्तनिरोध' की क्षमता रखने वाले व्यक्ति को 'स्थित-प्रज्ञ' कहा है। भगवान् का कथन है कि स्थित-प्रज्ञ व्यक्ति सारी सांसारिक कामनाओं को भूलकर केवल अपने आप में रमणशील होकर रहते हैं। वे न तो किसी दुःख के आने पर उद्विग्न होते हैं और न सुखभोग की सरिता में ही बह जाते हैं। उन पर भगवान् का पूर्ण अनुग्रह होता है जिससे वे मायिय द्वन्द्वों के द्वारा प्रभावान्वित होने के बिना, अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं। सूत्र २४ में योग की प्रक्रिया के द्वारा मनस् एवं प्राण अथवा प्राण एवं अपान को सुषुम्ना- धाम के अन्तर्वर्ती चिदाकाश में लय करने का भाव अभिव्यक्त किया गया है। इस सम्बन्ध में सूत्र में उल्लिखित कई पारिभाषिक शब्दों पर यथासम्भव प्रकाश डालना आवश्यक है— सोमसूर्य—भट्टकल्लट ने अपनी वृत्ति में इन दो शब्दों को, व्याख्या करने के बिना, अस्पष्ट रूप में ही छोड़ रखा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने जान-बूझ कर ही ऐसा किया होगा। आगमशास्त्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणाओं के आधार पर इस शब्द-युग्म के भिन्न भिन्न अर्थ लगाये हैं। कहीं इनसे प्रमेयपद और प्रमाणपद का, कहीं प्राण और अपान का अथवा कहीं शिवकला और जीवकला का अर्थ लिया गया है। शायद भट्टकल्लट ने भी इसीबात को दृष्टि में रखकर, इस शब्द-युग्म को किसी निश्चित अर्थ की परिधि में बांधने के बिना साधकों की रुचि पर ही छोड़ दिया है। आध्यात्मिक विषयों की चर्चा करते समय अत्यन्त सावधानी से काम लेना आवश्यक है अतः केवल इतना कहा जा सकता है कि प्रस्तुत सूत्र में पूर्व प्रकरण के आधार पर इन दो शब्दों से 'मनस् एवं प्राण ये ही दो अभिप्राय लेना युक्तिसंगत है। कारण यह कि पूर्ववर्ती १. चन्द्रसूर्यौ मनःप्राणौ द्वावपि। (स्प० का०, ७६ पृष्ठ)