भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 190 में से

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११० स्पन्दकारिका सूत्रों में इस सिद्धान्त की स्थापना की गई है कि सामान्य स्पन्द-शक्ति एक ओर से ज्ञानरूपता के द्वारा गुणत्रय पर आधारित अन्तःकरण की वृत्तियों (जिनको साधारण रूप में मनस् या चित्त कहते हैं) और दूसरी ओर क्रियारूपता के द्वारा पाँच स्थूल प्राणों के रूप में, पाञ्चभौतिक काया में व्याप्त होकर रहती है । कहना न होगा कि अपान स्वयं भी पांच प्रकार के स्थूल प्राणों में ही अन्तर्भूत हो जाता है । फलतः योगी के लिए, प्राण के साथ मनस् का भी चिदाकाश में लयीकरण परम आवश्यक है । श्रीयुत क्षेमराज ने अपनी व्याख्या में इस शब्द-युग्म का अर्थ १ प्राण एवं अपान ही लगाया है । सुषुम्ना मार्ग—आगम शास्त्रों में सुषुम्ना नाडी का प्रधान नाम 'मध्यनाडी' रखा गया है । भट्टकल्लट ने भी अपनी वृत्ति में इसी नाम से इसका उल्लेख किया है । इसके अतिरिक्त इसको 'ब्रह्मनाडी' भी कहते हैं । इस नाडी को 'मध्य' कहे जाने के दो कारण हैं । एक यह कि मूलरूप में यह नाडी स्वतः संवित्-रूपा ही है और संवित् ही प्रत्येक जड़ अथवा चेतन पदार्थ का 'मध्य' अर्थात् २अन्तरतम जीवन है । प्रत्येक प्राणी के शरीर में यही नाडी जीवनी शक्ति का मूलस्रोत है । पहले भी कहा गया है कि संवित् भगवती ही अवरोहक्रम में सूक्ष्म ३प्राणना का रूप धारण करके, क्रमशः उत्तरोत्तर स्थूलता को प्राप्त होती हुई, समूचे अस्थिमेदोमय स्थूल शरीरका और उसमें फैली हुई असंख्य शिराओं के जाल का रूप धारण कर लेती है । ४स्वयं इन असंख्य नाडियों के जाल के ठीक मध्य में ब्रह्मरन्ध्र से लेकर मूलाधार तक प्रधान प्राणशक्ति- रूपा सुषुम्नानाडी के रूप से अवस्थित रहती है । शिराजाल के ठीक मध्य में इसका अवस्थित रहना ही दूसरा कारण है जिसके लिये इसको 'मध्य' की संज्ञा दी गयी है । शिराजाल के ५मध्य में यह ठीक उसीप्रकार ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है जिस प्रकार पलाश के पत्ते के ठीक बीचोबीच एक प्रधान शिरा ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है । मध्यनाडी के आकार-प्रकार के विषय में अनुभवी व्यक्तियों का कथन है कि यह नाडी ६मृणाल के तन्तु के समान अत्यन्त सूक्ष्म है । इसके अन्तराल में ७शून्य अवकाश की वर्तमानता है और उसी को सूत्रकार ने 'महान् व्योम' की संज्ञा के द्वारा अभिव्यक्त किया है । यह अन्त- १. चन्द्रसूर्यौ अपानः प्राणश्चोभावपि । (स्प० का०, ४२ पृष्ठ) २. सर्वान्तरतमत्वेन वर्तमानत्वात् ......... संविदेव भगवती मध्यम् । (प्र० हृ०, १७) ३. सा तु मायादशायां .... प्राणशक्तिभूमिं स्वीकृत्य, अवरोहक्रमेण बुद्धिदेहादिभुवम् अधिशयाना नाडीसहस्रसरणिम् अनुसृता । (प्र० हृ०, १७) ४. तत्रापि च पलाशपर्णमध्यशाखान्यायेन आब्रह्मरन्ध्राद् अधोवक्त्रपर्यन्तं प्राणशक्तिमध्यनाडी- रूपतया प्राधान्येन स्थिता । (तत्रैव) ५. मध्यनाडी मध्यसंस्था । (वि० भै०, ३५) ६. सूक्ष्मत्वात् मृणालसूत्रतुल्यरूपतया (प्र० हृ०, १७) मध्यनाड्या मन्तश्चिदात्मकं शून्यमेवास्ति । (तत्रैव)