भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 190 में से

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दूसरा निःष्यन्द 'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द यहाँ तक के प्रकरण में ग्रन्थकार ने अनेक युक्तियों और उपपत्तियों के द्वारा यह तथ्य निर्धारित किया कि विश्व के कण कण में चैतन्यमयी स्पन्दशक्ति सामान्यरूप में अनुस्यूत है। योगी लोग पूर्वोक्त विकल्पसंस्कार की प्रक्रिया के द्वारा अपने संवेदन को निर्मल बना कर, अपने ही हृदयमण्डल में इस शाक्त-भूमिका की अनुभूति प्राप्त करते हैं। फलस्वरूप वे पशुभाव की संकुचित सीमाओं को लांघ कर असीम विश्वात्मभाव में लय हो जाते हैं। अब प्रस्तुत प्रकरण के सूत्रों में आध्यात्मिक उपलब्धियों के आधार पर इस रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि विकल्प-संस्कार की प्रक्रिया का निरन्तर अभ्यास करने से प्रबुद्ध योगियों के हृदयों में 'सहजविद्या' का उदय हो जाता है। शुद्ध विकल्प अथवा अहंविमर्शात्मक स्वरूप की यथार्थ अनुभूति ही इस 'सहजविद्या' का स्वरूप होता है। निर्मल हृदय में शुद्धविद्या का प्रकाश फैल जाने से ही योगी को वास्तविक स्वरूप का परिचय प्राप्त होता है। उसको मन्त्रवीर्य का अनुभव हो जाता है ओर वह प्रबुद्ध अवस्था से निकल कर सुप्रबुद्ध अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है। [ मन्त्र और मन्त्रवीर्य ] इस सम्बन्ध में अब सूत्रकार अगले दो सूत्रों में इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं कि सिद्ध योगियों की वाणी में ऐसे आत्मबल का संचार हो जाता है कि उनके द्वारा उच्चारे गये मन्त्र कागज के पत्रों पर लिखे हुए साधारण वर्णमात्र न रह कर अमोघ वीर्य बन जाते हैं। उनमें, योगी की रुचि के अनुसार भोगरूप या मोक्षरूप फलों को प्राप्त करवाने की क्षमता निश्चित बन जाती है :- तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ॥ २६ ॥ तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिना बलेन श्लाघायुक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे। करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि- विशेषेण ॥ २६ ॥ तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः । सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, मायाकालुष्य- रहिताः, सह साधकचित्तेन; अनेन कारणेन शिवसंयोजनास्वभावेन इति शिवात्मका उच्यन्ते ॥ २७ ॥