स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र और मन्त्रवीर्य ११३ अनुवाद सूत्र—प्रत्येक प्रकार के मन्त्र उस स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तादात्म्य प्राप्त करने से ही सर्वज्ञता इत्यादि (छः प्रकार के) माहेश्वर ¹बलों को प्राप्त करके शोभित होने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में वे (मन्त्र) किसी भी मनचाहे कार्य को अधिकार पूर्वक सिद्ध करने के लिये, उसी प्रकार, सहज ही में प्रवृत्त होते हैं जिस प्रकार शरीरधारियों की इन्द्रियां संकल्प- मात्र से ही अपने अपने कार्यों को सिद्ध कर देती हैं ॥ २६ ॥ वृत्ति—सारे मन्त्र उस आवरणहीन चिद्रूपता के साथ एकाकार होने से ही सर्वज्ञता इत्यादि माहेश्वर बलों को प्राप्त करके श्लाघ्य बन जाते हैं और शरीरधारियों की इन्द्रियों की तरह हो, अपने अनुग्रह इत्यादि अधिकारिता के कामों की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। (आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बिना) वे किसी दूसरे प्रकार के आकार विशेष अर्थात् अक्षरों और मात्राओं की (किसी पुस्तकादि में अंकित) विशेष रचनामात्र के द्वारा किसी भी कार्य को सिद्ध नहीं कर सकते हैं ॥ २६ ॥ सूत्र—(दूसरी ओर) वे मन्त्र शान्तरूप अर्थात् शुद्ध संवित्-रूप और निरञ्जन अर्थात् मायीय उपराग से रहित होकर, आराधना करने वाले के चित्त के साथ-साथ, चिदाकाश में ही लीन हो जाते हैं। इस कारण सारे मूलतः शिवधर्मा अर्थात् शिवरूप ही हैं ॥२७॥ वृत्ति—ये ही मन्त्र सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर और माया के उपराग से रहित होकर शान्तरूप बन जाने के कारण, साधक के चित्त के साथ ही उस स्वभाव अर्थात् विशुद्ध चिद्-रूपता या दूसरे शब्दों में सामान्य-स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका के असीम अवकाश में लीन हो जाते हैं। वास्तव में प्रत्येक प्रकार के मन्त्र का पार्यन्तिक एवं अनौपचारिक स्वभाव यही है कि वह (पशुभाव में पड़ी हुई) आत्मा को शिवभाव के साथ एकाकार बना लेता है। इन कारणों से सारे मन्त्रों को शिवात्मक अर्थात् शिवरूप ही कहा जाता है ॥ २७ ॥ विवरण भोगरूप और मोक्षरूप फलों के आधार पर मन्त्र दो प्रकार के हैं—(१) साञ्जन, (२) निरञ्जन । मन्त्रशक्ति का साञ्जनरूप वह है जिसको सांसारिक भोगरूप फलों को प्राप्त करने के अभिप्राय से प्रयोग में लाया जाता है। कई साधक, अपने में मन्त्रवीर्य को विकसित करने के अनन्तर, उसके द्वारा दैनिक जीवव्यवहार के साथ सम्बन्ध रखने वाले कार्यों को सिद्ध करने लगते हैं। उदाहरणार्थ वे किसी पर अनुग्रह, किसी पर निग्रह, किसी का रोगनिवारण, किसी का मारण इत्यादि अवरकोटि के लक्ष्यों को पूरा करने में लग जाते हैं। ऐसे मन्त्र मायीय उपरागों के द्वारा ही रंजित होने के कारण 'साञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं। १. सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि-बोध, अप्रतिहत-स्वातन्त्र्य, शक्ति का निर्वाध प्रसार, विश्वरूप में विकसित अनन्त शक्तियों का ऐश्वर्य, ये छः प्रकार के माहेश्वर बल हैं। ८