भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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मन्त्रदेवता और चित्त १२१ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri अनुभूति हमेशा भावरूप में ही होती है, अभावरूप में नहीं। उदाहरणार्थ संवेदन में आकाशपुष्प इत्यादि अभावरूप पदर्थों का अस्तित्व भी घट-पट इत्यादि भावरूप पदार्थों का जैसा ही होता है। वास्तव में यह बात निर्विवाद है कि संवेदन में जो कुछ है उसी का अस्तित्व है, अन्य का नहीं। १जीवात्मा को जिस समय किसी विषय की ओर संवेदनात्मक उन्मुखता हो जाती है उस संवेद्यमानता के समय में वही विषय उसका शरीर बन जाता है क्योंकि उस समय संवेदन तद्-रूप ही बन जाता है। वास्तव में संवेद्यमानता२ शब्द का अभिप्रायः ही यह है कि उस समय संवेदन उसी विषय के रूप में प्रकाशमान होने लगता है। संवेद्यमानता के किसी विषय को शरीर के रूप में ग्रहण करने का ही अर्थ यह है कि उस समय जीवात्मा स्वतन्त्र संवेदन के द्वारा उस विषय को सत्ता देकर उसकी सृष्टि करता है। दूसरे ही क्षण किसी दूसरे विषय की ओर संवेदनात्मक उन्मुखता हो जाने पर पहले विषय का संहार और दूसरे की सृष्टि का कार्य सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार जीवात्मा भी विश्वात्मा की तरह ही क्षण क्षण अन्यान्य शरीरों को स्वीकारता या नकारता हुआ, उनकी सृष्टि और संहार३ आदि करता रहता है। वस्तुस्थिति तो यही है, जिसका ऊपर उल्लेख किया जा चुका है। परन्तु शोक इस बात का है कि पशुभाव के कारागार का बन्दी अपनी पाञ्चभौतिक काया की दृढ प्राचीरों के बाहर भी फैले हुये अपने रूपविस्तार को देखता हुआ भी देख नहीं पाता है। यही शक्ति- दरिद्रता की विडम्बना है ।।२८-२९-३०।। [ अन्त्रदेवता और चित्त ] अगले दो सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि आत्मसत्ता की ऐसी ही पूर्वोक्त व्यापकता का बार बार अनुसन्धान करने से योगी का संवेदन इतना तीव्र हो जाता है कि मन्त्र का उच्चारण करने से तत्काल ही उसका चित्त मन्त्र के देवता के साथ एकाकार हो जाता है। यह तीव्र एकाग्रता ही उसको अन्ततोगत्वा शिवभाव पर पहुँचा देती है— अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि । तदात्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या ॥३१॥ तत्संवेदनद्वारेण यः तदात्मग्रहो मन्त्रन्यासात्मकः स एवोदयः तस्य ध्येयस्य मन्त्रात्मनः साधकचेतसि, तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ।।३१।। १. एवञ्च...............संवेद्यमानतावस्थायामेव शरीरी भवति । ( स्प० का० वि०, ३.३ ) २. संवेद्यमानता च तेन तेन रूपेण प्रकाशमानता (तत्रैव)। ३. शेष तीन कृत्यों की प्रक्रिया को समझने के लिये विशेषरूप से द्रष्टव्य—'स्पन्दसंदोह' क्षेमराजाचार्यकृत । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal