स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ स्पन्दकारिका इयमेवामृतप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः । इयं निर्वाणदीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥३२॥ इयमेव सा मिथ्याज्ञानशून्यस्य साधकस्य निरावरणस्वस्वरूपसंवित्तिः अमृतत्व- प्राप्तिः न तु रसास्वादरूपस्य धातुसारस्य स्थूलस्यास्वादनम् अमृतप्राप्तिरुक्ता, यैव मन्त्रो- च्चारणमात्रेणैव मन्त्रस्वरूपावस्थिति प्राप्तिः सैवात्मनो ग्रहणमित्युक्ता । यस्मात् 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया' इति । न पुनर्लोष्टादिवत् हस्तेन तस्यामूर्तस्य ग्रहणं भवति, अत एव चेयमेव सा निर्वाणदीक्षा शिवसद्भावदायिनी, परमशिवस्वरूपाभिव्य- ञ्जिका ॥३२॥ अनुवाद सूत्र—ध्यान करने वाले (योगी) के चित्त में, ध्येय (ध्यान का विषय बने हुये देवता) का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना इसी को कहते हैं कि उसके चित्त की (मन्त्र का उच्चारण करने की) इच्छा होने के तत्काल ही उसके साथ (देवता के साथ) तादात्म्य हो जाता है ॥३१॥ वृत्ति—संवेदन के द्वारा जो उस ध्येय अर्थात् मन्त्रस्वरूप अथवा मन्त्र के द्वारा ध्येय देवता का, मन्त्रात्मक या न्यासात्मक अर्थात् मन्त्र पढ़ने या न्यास करने के साथ ही, आत्मरूप में ग्रहण अर्थात् तादात्म्य हो जाता है, उसी को साधक के चित्त में उस देवता का उदय होना अर्थात् प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना कहते हैं। तादात्म्य हो जाने का अभिप्राय यह है कि साधक उस देवता के स्वभाव को ही प्राप्त कर लेता है। साधक का उस मन्त्रदेवता के साथ ऐसा तादात्म्य मन्त्र का उच्चारण करने की इच्छामात्र से ही सम्पन्न हो जाता है ॥३१॥ सूत्र—यही अमृत को प्राप्त करना होता है; इसी को आत्मा का ग्रहण१ कहते हैं, यही वास्तविक निर्वाण-दीक्षा होती है और यही (साधक को) शिवभाव की प्राप्ति करवा लेती है ॥३२॥ वृत्ति—ज्ञानी होने की ढोंगबाजी से रहित योगी का ऐसा आवरणहीन और निर्मल स्वात्मसंवेदन ही उसके लिये वास्तव में अमृतत्व अर्थात् अविनश्वर शिवभाव को प्राप्त करना होता है। इसके प्रतिकूल किसी स्थूल और २धातुओं के संमिश्रण से बनाये गये, शरीर के अन्तर्वर्ती धातुओं को पुष्टि देने वाले और स्वादिष्ट (केवल जीभ को मीठा लगने वाले) ३रस का आस्वाद लेना अमृतत्व को प्राप्त करना नहीं होता है। (साधनामार्ग में) आत्मग्रह १. शांभव और शाक्त उपायों के अधिकारी योगियों के लिए 'आत्मग्रह' आत्मज्ञान या स्वरूपविकास होता है और आणव उपाय पर अवस्थित अवर अधिकारियों के लिये इस शब्द का अर्थ 'मानसिक-निग्रह' होता है। २. यहाँ पर 'धातुओं' से वैद्यक के अनुसार धातुओं को फूँक कर बनाये गये भस्मों का अभिप्राय है। ३. वैद्यक के अनुसार धातुओं के भस्मों को मिलाकर बनाई गई स्वादिष्ट एवं पौष्टिक औषधियों को रस कहते हैं। यद्यपि वैद्यक में कहा गया है कि रस मनुष्य को अमर बना लेते हैं तथापि वह तो दीर्घायु को सूचित करने के लिये केवल एक औपचारिक प्रयोग है।