स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाभास १४१ दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा, तदवस्थास्थ इव सर्वान् भावान् यदा व्याप्यावतिष्ठते, तदा किं बहुना उक्तेन, स्वयमेव तत्त्वस्वभावम् अवभोत्स्यते ज्ञास्यति ॥४३॥ अनुवाद सूत्र—जब योगी प्रत्येक भाव में केवल और केवल स्पन्दात्मक स्वरूप को निभालने का अटल संकल्प धारण करके, उनमें स्वरूपतः व्याप्त होकर अवस्थित रहता है तब वह स्वयं ही उस तत्त्व का साक्षात्कार करने में अवश्य सफल हो जाता है। इसमें बात-बढ़ाव करना बेकार है ॥४३॥ वृत्ति—देखने की तीव्र इच्छा को ‘दिदृक्षा’ कहते हैं। दिदृक्षा की अवस्था में वर्तमान होकर, जब योगी सारे भावों में स्वरूपतः व्याप्त होकर अवस्थित रहता है तब स्वयं ही उस स्वभावभूत स्पन्द तत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर लेता है इसमें अधिक बतियाने का कोई प्रयोजन नहीं है ॥४३॥ विवरण १किसी भी भाव का साक्षात्कार करने के समय दो प्रकार के आभास कार्यनिरत होते हैं। एक वह जो कि इन्द्रिय और भाव का संयोग होने के प्राथमिक क्षण का ‘विकल्पहीन आभास’ होता है और दूसरा वह जो कि दूसरे क्षण पर उसी भाव के साथ सम्बन्धित विशेष- ताओं को स्पष्टरूप में परिलक्षित कराने वाला ‘सविकल्प-आभास’ होता है। इनमें से पहला आभास इतना स्वरूप संकुचित होता है कि इसकी बिजली की जैसी तीव्रतम कौंध में, उस भाव में सामान्यरूप में परिनिष्ठित स्वरूपसत्ता के अतिरिक्त कोई भी अन्य जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छात्मक विशेषता परिलक्षित नहीं होती है। इस आभास को शास्त्रीय शब्दों में ‘प्रथमाभास’, ‘स्वरूपाभास’, ‘निर्विकल्पाभास’ अथवा ‘स्वलक्षणाभास’ इत्यादि कहते हैं। दूसरा आभास अनेक आभासों के मिश्रण के रूप वाला और स्थूल अभिलाप के द्वारा वाच्य होता है। उदा- हरणार्थ प्रथमाभास पर ‘घट’ नामक भाव का साक्षात्कार, ‘घट’ इस शब्द के द्वारा वाच्य और गोलाई, ललाई इत्यादि अनेक विकल्पों से युक्त घट के रूप में नहीं, अपितु सामान्य- प्रकाशात्मकता के रूप में होता है। दूसरे क्षण पर अर्थात् प्रथमाभास के ठीक अनन्तरवर्ती सविकल्पाभास पर ही इन सारे आभासों की मिश्रणा से, उसका साक्षात्कार, विशिष्ट नाम- रूपात्मक ‘घट’ के रूप में होता है। ऐसी ही संवेदनात्मक आभास प्रक्रिया के द्वारा घटाभास, पटाभास, सुखाभास, दुःखाभास इत्यादि अनन्त प्रकार के विकल्परूप (इसीलिये भेदपूर्ण) आभासों के वैचित्र्य की सर्जना हो जाती है; इन्हीं को प्रमेय जगत् कहते हैं। संक्षेप में इस प्रकार कहना ठीक है कि प्रथमाभास की भूमिका पर सारे भाव सामान्य स्पन्दरूप अथवा चित्-रूप ही हैं। अतः उनकी संवेदना भी विशुद्ध अहं-रूप है। सविकल्प आभास की भूमिका पर सारे भाव एक दूसरे से स्वरूपतः, देशतः, कालतः और आकारतः भिन्न होने के कारण विकल्परूप हैं। अतः उनका संवेदन भी ‘इदं-रूप’ है। १. यहाँ पर शैव दर्शन की प्रसिद्ध आभास प्रक्रिया का संकेतमात्र दिया जा रहा है। विशेष जानकारी के लिये ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ का ज्ञानाधिकार द्रष्टव्य है।