भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 190 में से

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१४२ स्पन्दकारिका संसार की प्रत्येक अर्थक्रिया सविकल्प-आभास पर ही चल सकती है क्योंकि इसके लिये भावों में भिन्नता का होना आवश्यक है। प्रस्तुत प्रकरण के साथ सम्बन्धित मितसिद्धियों का प्रदर्शन भी बाह्य-अर्थक्रिया होने के कारण सविकल्पक-आभास ही है अतः यह संसारभाव ही है, शिभाव नहीं। प्रथमाभास पर यद्यपि संसार के अणु-अणु में भी स्वरूप की अभिव्यक्ति प्रति समय होती रहती है तथापि वह साधारण इन्द्रियबोध के द्वारा गम्य नहीं है। योगियों में अदृश्य प्रेरणा से अतीन्द्रियबोध अथवा प्रातिभ-ज्ञान विकसित हुआ होता है। अतः वे भावों के प्रथमा- भास पर ही स्वरूप का साक्षात्कार करने में सक्षम होते हैं। फलतः वे प्रतिसमय प्रथमाभास पर ही अवस्थित रहने के कारण स्वरूप की चतुर्दिक् व्यापकता का अनुभव करते रहते हैं। प्रथमाभास पर अवस्थित रहकर प्रत्येक भाव में व्याप्त स्वरूप का साक्षात्कार करने की तीव्र इच्छा को ही सूत्र में 'दिदृक्षा' का नाम दिया गया है। यही वह पूर्वोक्त संकल्प-शक्ति है जो साधक को स्वयं ही शाक्त-भूमिका पर पहुँचा देती है। इस सम्बन्ध में कई मित्रों को यह आपत्ति है कि यदि योगी सदा निर्विकल्प आभास पर ही अवस्थित रहते हैं तो वे संसार का आदान-प्रदान किस प्रकार कर सकते हैं ? संसार में दिखाई देनेवाले भाववैचित्र्य की अनुभूति उनमें रहती ही नहीं होगी। अतः वे संवेदनाहीन ठूंठ जैसे पड़े रहते होंगे। इस शंका का समाधान पाने के लिये यह समझना आवश्यक है कि प्रथमाभास पर अवस्थित रहने का कदापि यह अर्थ नहीं कि योगियों को व्यक्त नामरूपात्मक जगत् का भाव- वैचित्र्य दिखता ही नहीं है। वे अपने प्रातिभ-ज्ञान के द्वारा बाह्य प्रकृति के भाववैचित्र्य का इतना सूक्ष्म और गम्भीर पर्यवेक्षण कर सकते हैं जितना कि साधारण रूप में कुशाग्रबुद्धि समझा जानेवाला पुरुष भी नहीं कर सकता है। बात केवल इतनी है कि वे लोग भाववैचित्र्य के जिस जिस पक्ष का साक्षात्कार करते हैं वह उन्हें आत्मरूप का विकासमात्र ही प्रतीत होता है। फलतः वे किसी भी अवस्था में अखण्ड स्वरूपभावना से गिरकर भेदभावना के पचड़े का शिकार नहीं बन पाते हैं। प्रथमाभास पर अवस्थित रहने का यही अभिप्राय है ॥४३॥ [ अनुभूति का उपाय ] अगले सूत्र में प्रबुद्ध योगियों को प्रत्येक भाव में स्वरूप की व्यापकता की अनुभूति प्राप्त कर सकने का उपाय समझाया जा रहा है :- प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोच्य गोचरम् । एकत्रारोपयेत् सर्वं ततोऽन्येन न पीड्यते ॥४४॥ प्रबुद्धोऽसंकुचितशक्तिः सर्वकालं तिष्ठेत्, ज्ञानेनालोच्य गोचरम्-ज्ञेयं परिच्छिद्य । एवमेकत्र तत्त्वसद्भावे विद्यात्मके आरोपयेत् सर्वम् । ततोऽन्येन वक्ष्यमाणेन कलासमूहेन नपीड्यते ॥४४॥