भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 190 में से

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१४८ स्पन्दकारिका योनि से शक्तिभाग का अभिप्राय है। व्याकरण में वर्णित संस्थानता के नियम से दोनों एक दूसरे में अन्तर्निहित हैं। नव¹ प्रकार के भेद १. अवर्ग 'अ' से 'अः' तक (अमा) २. कवर्ग 'क' से 'ङ' तक (कामा) ३. चवर्ग 'च' से 'ञ' तक (चार्वङ्गी) ४. टवर्ग 'ट' से 'ण' तक (टङ्कधारिणी) ५. तवर्ग 'त' से 'न' तक (तारा) ६. पवर्ग 'प' से 'म' तक (पार्वती) ७. यवर्ग 'य' से 'व' तक (यक्षिणी) ८. शवर्ग 'श' से 'ह' तक (शारिका) ९. क्षवर्ग 'क्ष' (अनुत्तर एवं अनाहत के संघट्ट को अभिव्यक्त करनेवाला कूटबीज) वर्गभेद के विषय में यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वास्तव में वर्णसमाम्नाय के १ से ८ तक के ही वर्ग मुख्य हैं। 'क्ष' को मात्र औपचारिकता से ही एक पृथक् वर्ग में रखा गया है, क्योंकि इसका अन्तर्भाव 'क' और 'स' के रूप में पहले ही आठ वर्गों में हो जाता है। इन दो वर्णों का संयुक्त-रूप होने के कारण यह स्वयं कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं है। इसको अलग वर्गरूप में रखने का कारण केवल इतना है कि यह अनुत्तर वाचक 'ककार' और विसर्गवाचक 'सकार' का संयुक्तरूप एक ²कूटबीज है जो कि इस बात को अभिव्यक्त करता है कि मातृका का प्रत्येक वर्ण, शिवभाग और शक्तिभाग का संघट्टरूप है। यही कारण है कि इसको शब्दराशि के अन्त में रखा गया है। पचास प्रकार के भेद—शब्दराशि के ³प्रत्येक अक्षर को अलग-अलग शक्तिरूप मानकर सोलह स्वरों और चौंतीस व्यंजनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की गई है। वर्णसमाम्नाय के आठ वर्ग वास्तव में भेदभूमिका पर अवतीर्ण विमर्शशक्ति के ही आठ⁴ रूप हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—'माहेशी, ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री, याम्या, चामुण्डा और योगेशी'। इन आठ शक्तियों को पारिभाषिक शब्दों में 'पीठेश्वरियाँ' कहते हैं। इनकी क्रिया द्विमुखी है। साधारण पशुओं के लिए ये प्रतिक्षण अधिकाधिक विकल्प-परम्पराओं को जन्म १. नवधा वर्गभेदतः ॥ (तत्रैव) २. तदियत्पर्यन्तं यन्मातृकायास्तत्त्वं तदेव ककार-सकारप्रत्याहारेण, अनुत्तरविसर्गसंघट्टसारेण कूटबीजेन प्रदर्शितमन्ते। (शिवसूत्रवि०, २.७) ३. प्रतिवर्णविभेदेन शतार्धकिरणोज्ज्वला। रणोज्ज्वला। (मा० वि०, ३. ११) ४. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम्। (मा० वि०, ३. १२)