स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४९ देती रहती हैं। ये अतीव भयानक हैं और ब्रह्मरंध्र में वर्तमान चित्-शक्ति को आड़ में रखकर, अनन्त प्रकार के स्थूल, अर्थात् वाणी के द्वारा अभिलापात्मक और सूक्ष्म, अर्थात् मानसिक संकल्प-विकल्पात्मक वाचकों और वाच्यों के इशारों पर, अज्ञानी जीवों को न जाने कितने और कैसे नाच नचती¹ रहती हैं। दूसरी ओर जिन भाग्यशाली पुरुषों में ईश्वरीय अनुग्रह से सद्विवेक का उदय हुआ हो उनको ये इसी शब्दराशि में अन्तर्निहित शाक्तबल की अनुभूति करवा कर शिवभाव पर पहुँचाने में पथप्रदर्शन भी करती हैं। आखिरकार वाणी ही मनुष्य को मार भी लेती है और तार भी लेती है। मातृका-शक्ति के ये उपर्युक्त आठ भेद केवल विषय को सुगम बनाने के लिये प्रधानरूप में स्वीकारे गये हैं। वस्तुस्थिति तो यह है कि संसार में प्रतिक्षण वाच्यवाचकात्मक विकल्प-परम्पराओं की जितनी भी अगणित श्रृंखलाओं की अनन्त कड़ियाँ प्रसर में आती हैं, वे तो शक्ति के ही अनन्त रूप हैं। अतः उनको यथावत् रूप में गिना नहीं जा सकता है। यह अनन्त प्रकार का शक्तिवर्ग भिन्न-भिन्न प्रकृतिवाले प्रमाताओं को भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाओं का विषय बना लेता है। साधारणतया तीन गुणों के आधार पर प्रकृति तीन प्रकार की हैं अतः शास्त्रकारों ने तदनुकूल ²कार्यभेद के अनुसार इस शक्तिवर्ग के भी तीन रूप स्वीकार किये हैं। इनका विवरण इस प्रकार है :— १. ³घोरतरा (अपरा)—प्रधानतया तामसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तिवर्ग का रूप महान् भयानक है। यह उनको प्रतिसमय केवल कनक-कामिनी अथवा दूसरे प्रकार के सांसारिक विषयोपभोग की वारुणी पिला-पिला कर अचेत बना देता है और निरन्तर अधोगति की निचली सीढ़ी की ओर लुढ़काता रहता है। २. ⁴घोरा (परापरा)—प्रधानतया राजसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तियों का रूप घोर अर्थात् भयानक ही है परन्तु घोरतर रूप जैसा भयंकर नहीं है। अभिप्राय यह कि इस स्तर पर अवस्थित व्यक्ति पर, यदि ईश्वरीय अनुग्रह हो तो वह अपना उद्धार भी कर सकता है। घोरा शक्तियाँ पशुओं के मन में मिश्रित (शुभ एवं अशुभ) कर्मफलों के प्रति आसक्ति उत्पन्न करती हैं और साधारणतया उनके लिये मुक्ति का द्वार बन्द ही रखती हैं। १. करन्ध्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः। पीठेश्वर्यो महाघोरा नर्तयन्ति मुहुर्मुहुः ॥ (तिमिरोद्घाट, शिवसूत्र, १.१४ में उदाहृत) २. अनन्तस्यापि भेदस्य शिवशक्तेर्महात्मनः। कार्यभेदान्महादेवि ! त्रैविध्यं समुदाहृतम् ॥ (मा० वि०, ३.३०) ३. विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् । रुद्राणून् या समालिङ्ग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥ (मा० वि०, ३.३१) ४. मिश्रकर्मफलासक्तिं पूर्ववज्जनयन्ति याः । मुक्तिमार्गनिरोधिन्यास्ताः स्युर्घोराः परापराः ॥ (तत्रैव, ३.३२)