स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ स्पन्दकारिका के लिये, उनको दिखाई होगी। निःसंदेह श्री भट्टकल्लट को जो उपदेश मिला वह साक्षात् सूत्रकार से ही मिला। इसके प्रतिकूल अन्य टीकाकारों के पास जो कुछ पहुँचा वह उन्हीं के माध्यम से पहुँचा। कई परिस्थितियों में उसके पहुँचने में कई पीढ़ियों का समय लग गया और इतने समय में वह कितनी मात्रा तक बासी हो गया इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। तीसरा कारण यह है कि यदि श्री क्षेमराजाचार्य की निर्णय नामक टीका और श्री भट्टकल्लट की प्रस्तुत वृत्ति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि जहाँ पहली दुरूह, अस्पष्ट एवं अपेक्षा से अधिक अन्तर्मुखीन प्रवृत्तियों को लिये हुए है, वहाँ दूसरी सरल, स्पष्ट, व्यावहारिक एवं साधारण से साधारण और आध्यात्मिक दांव-पेचों से बिल्कुल अनभिज्ञ व्यक्तियों को भी किसी न किसी रूप में लाभ पहुँचानेवाली है। हिन्दी अनुवाद मूल सूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद करते समय, अपनी ओर से, इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि सूत्रकार या वृत्तिकार के आशय को कोई क्षति न पहुँचे। पारिभाषिक शब्दों के साथ छेड़खानी करना या उनको तोड़-मरोड़ कर नये रूप में प्रस्तुत करना अथवा शब्दकोषों के पन्ने उलट-पलट कर उनके स्थान पर दूसरे उपयुक्त या अनुपयुक्त शब्दों को ठूंसने की हिमाकत करना भी उपयुक्त प्रतीत न हुआ, अतः उनको अपने ही रूप में रहने दिया है। जहाँ जहाँ आवश्यक जान पड़ा, वहाँ वहाँ पाठकों की सुगमता के लिये, कोष्ठकों का प्रयोग करके ऐसे शब्दों के अभिप्राय को समझाने का प्रयत्न किया गया है। पारिभाषिक शब्दों को अपने यथावत् रूप में रहने देना इस दृष्टि से भी उचित जान पड़ा कि ऐसा करने से हिन्दी भाषा के शब्द-कोष में अपेक्षित वृद्धि ही होगी। संस्कृत भाषा हिन्दी की जननी है, यह मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं अतः यदि दैवयोग से जननी की वस्तु पुत्री को उत्तराधिकार में मिल गई तो यह किसी अलक्षित रूप में मणिकाञ्चन-संयोग ही हुआ। विवरणों के विषय में प्रत्येक विवरण स्पन्द-सूत्रों के अन्तर्निहित अभिप्राय तक ही सीमित न रखकर, समूचे शैवदर्शन के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है। इस बात का पहले ही उल्लेख किया गया है कि शैवदर्शन की मौलिक मान्यताओं की, जितनी विशद एवं विस्तृत व्याख्या प्रत्यभिज्ञाग्रन्थों में उतनी स्पन्दग्रन्थों में नहीं की गई है। फलतः किसी भी स्पन्द-ग्रन्थ या प्रत्यभिज्ञा-ग्रन्थ का अध्ययन करने के इच्छुक पाठक को जबतक इस दर्शन के मौलिक सिद्धान्तों की, विस्तृत रूप में, जानकारी न हो तबतक उसके लिये, प्रतिपाद्य विषय को पूर्णतया हृदयंगम बनाना या उसके रस का आस्वादन करना, कठिन ही है। यही कारण है कि विवरणों का क्षेत्र स्पन्द सूत्रों तक ही सीमित न रखकर प्रत्यभिज्ञा-ग्रन्थों और आगम-ग्रन्थों तक भी विस्तृत किया गया है। क्षेत्र को विस्तृत करने के साथ साथ, इनको, यथासम्भव संक्षिप्त बनाने का प्रयत्न तो किया गया परन्तु इतना संक्षिप्त भी नहीं कि मुख्य सैद्धान्तिक बातें ही अपूर्ण रह गई हों। इस सम्बन्ध में सज्जन पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना आवश्यक है कि किसी भी विवरण को शैव आचार्यों के पारस्परिक मतभेदों और तार्किक घात-प्रतिघातों