भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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भूमिका १३ का अखाड़ा नहीं बनने दिया है और न इनमें भारत के अन्य दर्शनों के साथ शैव दर्शन की तुलनात्मक समीक्षा को ही प्रस्तुत किया गया है। इसका कारण यह कि प्रस्तुत प्रयास का लक्ष्य शैव दर्शन के मुख्य-सिद्धान्तों को अपने यथावत् रूप में प्रस्तुत करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रहा है। सारे विवरण केवल इस दृष्टिकोण को अपनाकर लिखे गये हैं कि शैव दर्शन के विचार संस्कृत भाषा को न जाननेवाले पाठकों तक भी पहुँच जायें। प्रस्तुत लेखक फिर एक बार गुरुचरणों में नतमस्तक होने के साथ-साथ, सुश्री शारिका- देवी और उनकी अनुजा सुश्री प्रभादेवी का आभार मुक्तकंठ से स्वीकार करता है क्योंकि उन्होंने समय समय पर समुचित सुझाव देकर उसके साहस को बढ़ाया। इसके अतिरिक्त उन सारे हितैषी मित्रों को धन्यवाद देना लेखक का आवश्यक कर्तव्य है, जिन्होंने इस दिशा में आगे बढ़ने के लिये किसी न किसी रूप में उसको सहायता प्रदान की है। विशेष रूप में श्री राधाकृष्णजी मिसकीन लेखक के हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि उन्होंने उसके मन में विद्यमान 'शूलाम्बुज' की कल्पना को साकार रूप दे दिया। कनिष्ठ भ्राता श्री राधाकृष्णजी और बन्धुवर श्री ओमप्रकाशजी कौल को, इस रचना को बार बार लिखने और इसकी अन्तिम प्रेस-कापी बनाने में जो कष्ट उठाना पड़ा, उसके बदले में लेखक की कामना यही है कि भगवान् आशुतोष उनपर करुणामृत की वर्षा करें। परिशिष्ट बनाने में मित्रवर श्रीकन्हैयालाल स्वरूप का योगदान उनके लिये स्वरूप-उन्मेष का उपक्रम है। मेसर्स मोतीलाल बनारसीदासवालों को भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रहा जाता है। उन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन का भार अपने ऊपर लेकर भारतीय साहित्य का जीर्णोद्धार करने के प्रति अपनी सच्ची निष्ठा के भाव का प्रदर्शन किया। मानव पग-पग पर स्खलनशील है। यह ठीक भी है क्योंकि यदि सांसारिक मानव में स्खलन ही न हो तो उसकी संसारिता ही कैसी ? फलतः प्रस्तुत प्रयास में भी विद्वज्जनों को पग-पग पर स्खलन दिखाई देंगे। ऐसी परिस्थिति में उनसे यही विनम्र निवेदन है कि वे अपने अमूल्य सुझाव भेजकर लेखक को कृतार्थ करें ताकि अगले संस्करण में तदनुसार त्रुटियों को दूर करने का प्रयत्न किया जाये। करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी— शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः। श्रीनगर कश्मीर नीलकंठ गुरुटू ७-११-१९७६