स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ मौलिक चैतन्य सत्ता शाश्वत रूप में विद्यमान है। उस सत्ता का नाम 'शंकर' या 'शिव' रखा गया है। यद्यपि वह नाम-रूप से परे है तथापि उसका ऐसा नामकरण करने में एक विशेष अभिप्राय अन्तर्निहित है। वह यह कि सामान्य रूप में स्वतन्त्र इच्छा के द्वारा सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह ये पाँच कृत्य, प्रति समय करते रहने पर भी उसका अनुग्रहात्मक कृत्य एक ऐसा विशेष कृत्य है जिसके द्वारा वह जन्म-मरण-रूपी चक्की के पाटों में पिसे जाते हुए अणओं के सारे भेदभावना से पूर्ण अज्ञान को दूर करके, उनको, स्पन्द- मयी शक्ति-भूमिका पर आरूढ करने के रूप में, उनका कल्याण करता है। 'शम्' = कल्याण + 'कर' = करने वाला शङ्कर कहा जाता है। वह शङ्कर चैतन्यरूप है अर्थात् वह चेतने की क्रिया का स्वतन्त्र कर्ता है। चेतन वही है जो चेतने की क्रिया करने में स्वतन्त्र हो। उदाहरणार्थ 'घट'१ चेतन नहीं है क्योंकि उसको न तो अपने और न अपने से भिन्न किसी दूसरे के होने की चेतना है। फलतः वह अचेतन है। इसके प्रतिकूल 'चैत्र'२ नाम वाले व्यक्ति में चेतना की ऐसी विभूति विद्यमान है कि वह 'अहं'-रूप आवेग के द्वारा स्वात्मरूप में और अपने से भिन्न नील, पीत, सुख, दुःख या इनके अभावात्मक शून्यरूप में भी, अवभासित होने में स्वतन्त्र है। फलतः वह चेतनेवाला 'चेतन' है और चेतन कहा जाता है। शङ्कर भी प्रकाशविमर्शमय होने के कारण अपने स्वरूप को और अपनी ही शक्ति के प्रसाररूप विश्व को 'अहं'३ रूप में विमर्श करने अथवा चेतने की क्रिया का स्वतन्त्र कर्ता है। अतः वह चैतन्य है। उसका स्वभाव यही है कि वह स्वतन्त्र ज्ञाता और स्वतन्त्र कर्ता है। फलतः वह स्वतन्त्र है और स्वातन्त्र्य ही उसकी मुख्य४ शक्ति है। उसी स्वातन्त्र्यशक्ति को चेतनाशक्ति, चितिशक्ति, विमर्श, सार, हृदय, संवित्, ऊर्मि इत्यादि नामों से अभिव्यक्त किया जाता है। यह सर्वस्वतन्त्र चैतन्य सत्ता सारे विश्व की एकमात्र आत्मा है। इसका यह अर्थ नहीं कि जो आत्मसत्ता है वह चेतन है, अपितु चैतन्य ही आत्मा है, जिस प्रकार राहु५ का सिर कहना मात्र एक औपचारिक प्रयोग है, वास्तव में राहु और सिर एक ही वस्तु है। १. घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते, स्वात्मा न परामृश्यते, न स्वात्मनि तेन प्रकाश्यते, न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेत्यत इत्युच्यते । (ई० प्र० वि०, १.५.१३) २. चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते....नीलपीत- सुखदुःखतच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन अवभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यत इत्युच्यते । (ई० प्र० वि०, १.५.१३) ३. चितिः प्रत्यवमर्शात्मा । (ई० प्र०, १.५.१३) ४. स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यम् । (ई० प्र०, १.५.१३) ५. चैतन्यं चितिः, चेतन आत्मा इति राहोः शिर इतिवत् काल्पनिकम्, वस्तुत एकमेव सर्वम् । चितिक्रिया प्रकाशविमर्शः, तस्य भावः चैतन्यं स्वातन्त्र्यम् । (शि० सू० वि०, पृ० ४, टिप्पणी २१)