स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्पन्द एक गतिहीन गति १७ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri ऊपर कहा गया है कि शंकर की एक निजी अभिन्न शक्ति है। उसका नाम स्वातन्त्र्य- शक्ति है। वह शक्ति शिव से अभिन्न है क्योंकि शिव शक्ति के बिना नहीं है और शक्ति शिव के बिना नहीं रह सकती है। ये दोनों वास्तव में उसी प्रकार एक ही सत्ता के सूचक हैं, जिस प्रकार अग्नि और दाहशक्ति दो अलग पदार्थ नहीं हैं। स्पन्दशक्ति इस शक्ति का स्वरूप 'पूर्ण अहं-विमर्श' है। यह अहं-विमर्श ही वह मौलिक स्फुरणा है जिससे वह एक ही शक्ति अनन्त२ रूपों में स्फुरित होकर विश्व के अनन्त और विचित्र रूपों में अवभासमान है। शाश्वत रूप में स्फुरणशील होने के कारण ही उसको 'स्पन्दशक्ति' कहा जाता है। अब आगे इसी स्पन्दशक्ति के स्वरूप-विश्लेषण के विषय में कुछ मुख्य बातों पर प्रकाश डालना युक्तिसंगत होगा। स्पन्द शब्द का मूल धातु 'स्पदि' है जिसका अर्थ 'किञ्चित् चलन' अर्थात् सूक्ष्म अहं- विमर्शात्मक स्फुरणा है। साधारणरूप में 'स्फुरणा' या 'स्पन्द' शब्द से कम्पन या सिहरन का अर्थ लिया जाता है परन्तु यह अहँविमर्शात्मक स्पन्द वैसा स्थूल अथवा आँधी आदि के द्वारा हिलाये गये वृक्ष इत्यादि का कम्प जैसा नहीं समझना चाहिये, अपितु इसका रूप चिद्घन भग- वान् की बाह्य³ विश्वात्मक रूप में स्वतन्त्र शक्तिप्रसार की ओर संकल्पात्मक उन्मुखतामात्र ही समझना चाहिये। इस संकल्पात्मक उन्मुखता को सूत्रकार ने 'उन्मेष-निमेष' शब्द से अभिव्यक्त किया है। यह बात ध्यान में रखनी आवश्यक है कि यहाँ पर 'उन्मेष-निमेष' का अर्थ उन्मेष और निमेष नहीं है, अपितु विज्ञानरूप अनुत्तरतत्त्व की वह एक ही संकल्पात्मक गतिमयता, जिसका स्वरूप मात्र 'अहं प्रत्यवमर्श' ही है। शक्ति का रूप सदा उदित है अतः उसका न तो कभी उन्मेष अर्थात् उदय या विकास या सक्रियता, अथवा अस्त या संकोच या निष्क्रियता ही होती है। वास्तव में स्पन्दशक्ति का स्वरूप ही उच्छलनात्मक४ है। भाव यह कि वह युगपत् ही स्वरूप का विकास और संकोच करती है। फलतः यह शक्ति क्रियाशीलता युगपत् ही द्विमुखी अर्थात् अन्तर्मुखीन और बहिर्मुखीन भी है। परन्तु यह सारी क्रियात्मकता संकल्पात्मक ही है। निःसन्देह शंकरात्मक बोधगगन, मात्र अनुत्तर-तत्त्व है परन्तु उसका भी सारभूत हृदय५ विमर्शरूपा 'स्पन्दशक्ति' ही है। शक्तिपरिवलित होने के कारण ही उसमें विश्वो- १. न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिः शिववर्जिता। उभयोरस्ति तादात्म्यं वह्निदाहकयोरिव॥ २. शिवस्यैका महाशक्तिः शिवश्चैको ह्यनादिमान्। सा शक्तिर्भिद्यते देवि! भेदैरानन्त्यसम्भवैः॥ (स्व० तं०, ११.२७१) ३. यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया जगदिदं स्रष्टुम्। पस्पन्दे स स्पन्दः.... .... .... ॥ (ष० त० सं०, १) ४. स्वात्मन्युच्छलनात्मकः। (तं०, ४.१८३) ५. सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः। (ई० प्र०, १.५.१४) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal २