भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 190 में से

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१८ स्पन्दकारिका तीर्णता अर्थात् विशुद्ध ज्ञान-प्रधान प्रकाशरूपता और विश्वरूपता अर्थात् क्रियाप्रधान विमर्श- रूपता, मयूराण्ड में वर्तमान द्रवपदार्थ के ही रूप में अवस्थित आगामी शावक के विचित्र रंगों वाले परों की कल्पना के समान, अभेद 'अहं' रूप में ही अवस्थित है— 'संविन्निष्ठा हि विषयव्यवस्थितयः' । उपरिनिर्दिष्ट प्रकाशभाग और विमर्शभाग में से क्रियाप्रधान विमर्शभाग¹ ही सामान्य- स्पन्द है । उसी के द्वारा अन्तर्मुख 'अहं' में, अभिन्न रूप में अवस्थित, विश्वकल्पना का बहिर्मुख 'इदं' रूप में अवभासन और 'इदं' रूप में अवभासित विश्व की अन्तर्मुख अनुसंधा- नात्मक 'अहं'-रूपता में विश्रान्ति की क्रिया सम्पन्न होती है । विमर्श में जिस वस्तु का सद्भाव हो उसी का बाह्य अवभासन भी संभव हो सकता है । जिस पदार्थ का बाह्यरूप में अवभासन हुआ हो उसी का अन्तर्मुखता में विश्राम संभव हो सकता है । फलतः विमर्शात्मक स्पन्द-शक्ति का ही ऐसा स्वातन्त्र्य एवं असीम सामर्थ्य है कि वह अवभासित² पदार्थ को अपने रूप में लय कर सकती है; अपने आप को भावमण्डल के रूप में अवभासित कर सकती है; दोनों को एकाकार बनाकर धारण कर सकती है और दोनों से पृथक् रूप में भी अवस्थित रह सकती है। वास्तव में यह विमर्शात्मक स्फुरणा (स्पन्द-शक्ति) एक महान् सत्ता है जिसके बिना प्रकाश की कल्पना व्यर्थ है क्योंकि विमर्शहीन प्रकाश बिम्बग्राही होने पर भी जड़ ही होता है³ । अभी ऊपर कहा गया है कि स्पन्दशक्ति का स्वभाव किञ्चिच्चलन⁴ है । शैवशास्त्रों में किञ्चिच्चलन शब्द का अर्थ स्वतन्तरूप में स्फुरित होना है । संवित् कभी भी स्फुरणा के बिना नहीं रह सकती है क्योंकि वह फिर चिद्रूप ही नहीं हो सकती है । यदि ऐसा होता तो फिर चिद्रूपता के अभाव में सारे विश्व में जड़ कंकर पत्थरों के सिवा अन्य कोई जीवित सत्ता देखने को नहीं मिलती । वे जड़ वस्तुएँ भी हैं या नहीं यह भी कोई नहीं कह सकता । अतः उनकी सत्ता न होने के समान ही होती । फलतः संवित् प्रतिसमय प्रमाता और प्रमेय दोनों रूपों में सतत-स्फुरणा- १. हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः । भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ।। स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे···· ····। (तं, ४.१८२-८३) द्रष्टव्य—सूत्र १० का विवरण भी । २.. विमर्शो हि सर्वंसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं परीकरोति, उभयम् एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवंस्वभावः ॥ (ई० प्र० वि०, १.५.१३) ३. स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा । प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ।। (ई० प्र०, १.५.११) ४. किञ्चिच्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत् । ऊर्मिरेषा विबोधाब्धेः शक्तिरेवेह गण्यते ।। (तं० आ०,

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