भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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२४ स्पन्दकारिका आन्तरिक अनुभवमात्र से ही गम्य है। प्रत्येक प्रकार की शङ्काओं के आतङ्क और विकल्प- जालों से रहित होने के कारण इसको 'भैरवी-अवस्था' कहते हैं। यही अवस्था भैरवरूप शंकर का स्वभाव अथवा वास्तविक स्वरूप है क्योंकि इसमें विश्वोत्तीर्ण और विश्वरूपता दोनों एकाकार बनकर अवस्थित हैं।" 'शक्तन'१ अर्थात् कुछ कर सकने को 'शक्ति' कहते हैं। प्रत्येक चेतन प्रमाता अपनी अपनी परिधि में अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार कार्य कर सकता है क्योंकि उसमें अंशतः शक्ति विद्यमान होती है। जो जितना बड़ा काम कर सकता है उसको उतना बड़ा शक्तिमान् कहा जाता है। सबसे बड़ा काम, इतने अनन्त एवं कल्पना से भी अचिन्त्य विश्व का निर्माण एवं संहार है। इस दुर्घट कार्य को सबसे महान् शक्तिमान् ही कर सकता है। जो यह कर सकता है उस प्रमाता को सर्वशक्तिमान् भैरवरूप 'शंकर' कहते हैं। अंशतः शक्तिमान् होने के कारण प्रत्येक जीव अंशतः शिव है। अपनी२ ही शक्ति के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति प्राप्त करने से जीव शिव बन सकता है। शक्ति के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति मानव को क्या नहीं करा सकती है ? शक्तिभूमिका पर आरूढ़ होना ही शिवभाव में प्रविष्ट होने का मुख्यद्वार है। सूत्र में उल्लिखित 'शक्तिचक्रप्रभवम्' शब्द का तत्पुरुष समास के द्वारा परमात्मा के उन्मेषनिमेषात्मक स्वरूप और बहुव्रीहि समास के द्वारा ऐसी शाक्तभूमिका की अनुभूति प्राप्त करने के उपाय का अर्थ लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार है— १. शक्तिचक्रविभवस्य प्रभवम् [तत्पुरुष समास] शक्तिचक्र अर्थात् अनन्तरूपी प्रवह- मान स्पन्दधाराओं के, 'विभव' अर्थात् अन्तर्मुखीन या बहिर्मुखीन प्रसार को, 'प्रभवम्' मूल उद्गमस्थान शंकर (को हम प्रणाम करते हैं)। २. शक्तिचक्रविभवात् प्रभवो यस्य तम् [बहुव्रीहि समास] 'शक्तिचक्र' अर्थात् प्राण, बुद्धि, इन्द्रियां इत्यादि विशेष-रूपों में प्रवहमान शक्ति पुन्ज की, 'विभवात्' वास्तविक अनु- भूति प्राप्त करने से ही, 'प्रभव:' जिस शंकररूप की अभिव्यक्ति होती है— (उस शंकर को हम प्रणाम करते हैं)। इस विषय में शास्त्रों में यह बात स्पष्ट की गई है कि वास्तव में भगवान्३ स्वयं ही प्रत्येक प्राणी के शरीर में प्रविष्ट होकर, इन्द्रिय-शक्तियों की उन्मेषनिमेष क्रिया के द्वारा, शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध को ग्रहण या अग्रहण करने से, भिन्न-भिन्न प्राणियों की निश्चित देश, काल एवं आकार की परिधि के अनुसार, विश्व की सृष्टि और संहार करता रहता है। फलतः यदि कोई व्यक्ति किसी उपाय द्वारा अपनी विशेष रूपों में प्रवहमान १. 'शक्तनं शक्ति:'-सामर्थ्यं विश्वनिर्माणादिकारि भैरवस्वरूपमेव । (वि० भै० १३ पृष्ठ) २. शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना । तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवीमुखमिहोच्यते ॥ (वि० भै०, २०) ३. देहाद्याविष्टोऽपि परमेश्वरः करणोन्मीलननिमीलनाभ्यां रूपादिपञ्चकमयस्य जगतः सर्गसंहारौ करोति । (स्पं० नि०, पृष्ठ ८)