भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 190 में से

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स्पन्द एक मौलिक कृति २५ शक्तियों के संकोच को हटाकर, उनको मौलिक सामान्य-अवस्था पर पहुँचा सके तो स्वरूप- विकास कहीं दूर नहीं है। यहाँ पर पाठकों को सावधान करने के लिए कई मुख्य शक्तियों के नाममात्र गिनाये गये हैं। आगे बहुत से स्थानों पर इनके स्वरूप-वर्णन पर यथासम्भव प्रकाश डाला जायेगा ॥१॥ पूर्व सूत्र में दर्शाया गया कि सामान्य-स्पन्दभूमिका (संवित्) ही सारे कार्यरूप अर्थात् प्रमेयरूप विश्व के प्रत्येक पदार्थ के रूप में प्रवहमान है। परन्तु इस सम्बन्ध में यह शङ्का उठती है कि संसार में विचित्र प्रकार के शरीर, इन्द्रिय, भुवन, घट, पट इत्यादि रूपों में स्वभावों की अनेकाकारता देखने में आती है। ऐसी अवस्था में संसाररूप अनेकत्व का स्वभाव शिवरूप एकत्व कैसे हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान यह कह कर किया जा रहा है कि वास्तव में प्रमेयरूप अनेकाकारता 'अहं विमर्श' की एकाकारता में अनादिकाल से अभिन्नरूप में अन्तर्निहित ही है। केवल जो वस्तु विमर्श में है उसी का बाह्य अवभासन होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार उसका (अनेकाकारता का) बाह्य अवभासनमात्र हो जाता है। नई कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती है। दोनों रूपों में एकाकारता स्वरूपतः अक्षुण्ण रहती है— [कर्तृत्व और कार्यत्व] यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् । तस्यानावृतरूपत्वान्न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ॥२॥ कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः-इति यद्युच्यते, तत् यत्र स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्थवस्थायामपि अनाच्छादित- स्वभावत्वात् न क्वचित् निरोधः, अतः शिवत्वमुच्यते ॥२॥ अनुवाद सूत्र—जिस (स्पन्दात्मक) विमर्श-भूमिका में अर्थात् शङ्कर में यह सारा कार्यरूप (प्रमेयरूप) जगत्, अभेदरूप में अवस्थित ही है और जिससे इसका (बहिर्मुखीन) प्रसार हो जाता है, उस सत्ता के स्वरूप को कोई भी आवरण ढांप नहीं सकता है। अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कहीं भी कोई रुकावट नहीं है ॥२॥ वृत्ति—यदि कोई यह पूछे कि जब निजी स्वभाव (शंकर) ही संसारी बनकर आवा- गमन के चक्कर में पड़ जाता है तो उसको उस रूप में शिव कैसे कहा जा सकता है ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जाता है कि जिस अभेद-भूमिका में यह सारा विश्व (अनादिकाल से) 'अहं-रूप' में अवस्थित ही है और जिससे इसकी उत्पत्ति अहंरूपता से अलग होकर इदंरूपता में अवभासित हुई है, उस सत्ता के स्वभाव (अहंविमर्शरूप एकाकारता) पर, संसारी अवस्था में भी कोई आवरण पड़ा हुआ नहीं है, अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कोई रुकावट नहीं पड़ सकती है। यही कारण है कि उसको शिव कहा जाता है ॥२॥