स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ स्पन्दकारिका की इच्छावस्था में इष्यमाण पदार्थ उसके स्वरूप से व्यतिरिक्त नहीं होता उसी प्रकार ‘अनन्तावभासात्मक एवं अनन्तवैचित्र्यात्मक जगत् भगवान् की शक्ति से रंचमात्र भी व्यतिरिक्त नहीं है—१ ‘भगवतः शक्तौ अनन्तावभासविशेषचित्रं जगत् मनागपि । अनुपजातविशेषात् स्वरूपात् अव्यतिरेकेणैव अवतिष्ठते ॥' यह नश्वर नहीं शिवदशा है इसीलिए इसकी स्तुति की गई है—‘सेयं परमार्थ सती शिवदशा'— सदा सृष्टि विनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः ॥ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है— सा चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ परमात्मा की मात्र एक ही शक्ति है किन्तु उसके लिए—इच्छा ज्ञान क्रिया रूप में भिन्न-भिन्न प्रयोग किया जाता है—‘एकस्या एव पारमेश्वर्याः शक्तेः इच्छा-ज्ञान-क्रिया व्यपदेशः और उसे मायावश इदन्तोन्मिषित रूप में देखा जाता है । इसी प्रकार एक ही शिवतत्त्व में सदाशिवादि तत्त्वान्त अनेक व्यपदेश हुए हैं । इसीलिए पारमेश्वरी शक्ति स्वलीलोल्लासित जगत् की दो अवस्थाओं में वर्तमानता के कारण, दो प्रकार भी कही गई है । ‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ' का अर्थ यह होगा—‘यस्य इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ तं स्तुमः ॥' संकल्पसृष्टिवाद— उन्मेष-निमेष दो शब्द अवश्य प्रयुक्त हुए हैं किन्तु दोनों का अर्थ एक है—इसका अर्थ है—‘परमेश्वरेच्छा' उन्मेषेण उदयो, निमेषेण प्रलयः—इति तु अर्थसंख्या समवैति । इच्छामात्रम् उन्मेषनिमेषौ ॥ इसीलिए तो भट्टकल्लट ने 'उन्मेषनिमेष' की व्याख्या 'संकल्प' शब्द से की है—‘संकल्पमात्रेण' (भट्टकल्लट) ।२ आचार्य रामकण्ठ यह भी कहते हैं कि—१. जिन व्याख्याकारों ने यथासंख्य समर्थनानुरोध के कारण जिसके 'उन्मेष' में क्रियाशक्ति के प्रतिसंहार के कारण स्वरूप विकास में जगत् के प्रलय को विनाश के रूप में तथा २. 'निमेष' में क्रियाशक्ति के प्रसृत होने से स्वरूपसंकोच रूप में जगत् का उदय या उद्भव स्वीकार किया है और जो उन्मेष निमेष को शंकर का पारमार्थिक धर्म प्रतिपादित करते हैं उनकी व्याख्या काल्पनिक है और उन्होंने इस दर्शन को ठीक से हृदयंगम नहीं किया हैं—‘ते च काल्पनिकमेव अर्थ- परमार्थत्वेन प्रतिपद्यमानाः तथा दर्शनस्य अस्य अन्तरं नमु प्रविष्टाः । इति नमस्तेभ्यः ॥'३ अनेकात्मकता एवं एकात्मकता में सामरस्य—नित्याव्यभिचरदेकस्वभाव भगवान् की शक्ति भी इसी प्रकार एक है और परमात्मा से अभिन्न है । फिर ‘शक्तिचक्र' की बात १-३. स्पन्दकारिकाविवृति ।