भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः ७ २. 'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । (१९) (स्पन्द०) ३. 'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ।। २१ ।। (स्पन्द०) 'स्पन्द के निष्यन्द'— रामकण्ठाचार्य = 'उन्मेष-निमेष' = 'शक्तिप्रसर प्रलय' । रामकण्ठाचार्य का तर्क—भगवान् शंकर तो नित्य हैं, 'अव्यभिचरदेकस्वभाव' एवं 'एकमात्र पदार्थ' एवं परमार्थ पदार्थ हैं फिर उनके साथ अनित्य निमेषोन्मेष नामक परस्पर विरुद्ध अवस्थाद्वय का संबंध कैसे दिखाया गया ? यह हो सकता है कि—'कर्तृ- प्रथया हि अनया एवं प्रतिपाद्यते शंकर उन्मिषति निमिषन्ति इति ।।' (रामकण्ठ) किन्तु— नित्य भगवान् में 'अनित्यावस्था योगित्वं' अनुपपन्न है। फिर 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' क्यों कहा गया ? (रामकण्ठाचार्य) ।। पूर्वपक्ष के उपरान्त रामकण्ठ उत्तरपक्ष में कहते हैं कि—(१) 'उन्मेष' एवं 'निमेष' दोनों शब्द शांकरी इच्छा के द्योतक हैं और यह 'इच्छा' उनका स्वरूपभूत नित्य धर्म है—१. 'उन्मेष-निमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शंकर संबंधि प्रति- पाद्यते । स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः । २. उन्मेष-निमेष का द्वित्व मात्र उपचारवश है—'तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ।' इच्छाशक्ति या परमात्मा की संकल्प शक्ति को व्यक्त करने के लिए 'उन्मेष' एवं 'निमेष' दो शब्द का प्रयोग औपचारिक मात्र है क्योंकि ये दोनों शब्द परमात्मा के संकल्प या इच्छामात्र के द्योतक हैं—संकल्पात्मक गतिमयता या इच्छा ही दोनों का अर्थ है—इससे पृथक् कुछ नहीं है ।१ इच्छा सृष्टिवाद— तर्क यह है कि जगत् पारमेश्वरी मायाशक्ति के द्वारा उद्भावित होने के कारण (कार्य होने के कारण, अनित्य होने के कारण) अनित्यात्मक प्रलयोदय से तो प्रभावित होते ही हैं अतः निमेषोन्मेष तो होंगे ही किन्तु ये ईश्वरेच्छाप्रसूत मात्र ही हैं— 'निमेषोन्मेषौ वस्तुतः संभवतः । तौ च ईश्वरेच्छामात्रनिमित्तकौ ।' अतः—'उन्मेष' उदयात्मक होने के कारण यह ईश्वरेच्छा मात्र का ही द्योतक है—'उदयात्मकोन्मेषहेतु- त्वात् ईश्वरेच्छैव उन्मेष शब्देन ।' इसी प्रकार 'निमेष' शब्द प्रलयवाचक है । प्रलयवाची 'निमेष' भी इसी ईश्वरेच्छा का औपचारिक अर्थ द्योतित करता है जिस प्रकार कि आयु- प्रदायक घृत भी आयु कहा जाता है ।२ उन्मेष-निमेष भी शंकर की अव्यतिरिक्ता शक्ति हैं—'सा च अव्यतिरिक्ता शंकरस्य शक्तिः ।' उसका ज्ञान आत्मैश्वर्यप्रत्यभिज्ञालक्षण की सिद्धि का प्रतिपादक है । परमात्मा के अवगमार्थ ही 'इच्छा' शब्द को भी प्रयुक्त किया गया है । जिस प्रकार पुरुष १ - २. स्पन्दकारिकाविवृति ।