भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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१८ स्पन्दकारिका ३. 'विमर्श' प्रकाश का स्पन्दन है। 'प्रकाश' में स्पन्दन (प्राणभूत तत्त्व) न हो तो प्रकाश की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी। 'स्पन्दन' ही शिव की 'स्वातन्त्र्य शक्ति' है। 'स्पन्द शक्ति' की द्विमुखी गतिमयता अन्तर्मुख स्पन्द बहिर्मुख स्पन्द त्रिक् दर्शन [प्रत्यभिज्ञादर्शन प्रकाश पक्ष पर बल] [स्पन्ददर्शन पर तत्त्व के विमर्श पक्ष पर बल] १. पर तत्त्व के प्रकाश पक्ष का १. विश्वमयता में ही परतत्त्व के प्राधान्य विश्वातीत रूप में पूर्णतमा का दर्शन। परतत्त्व का प्रकाशन। २. प्रत्यभिज्ञा दर्शन। २. स्पन्ददर्शन। ३. सोमानन्द। ३. भट्टकल्लट। शक्ति-विशिष्ट शङ्कर की वन्दना यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ। तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ १ ॥ जिनके उन्मेष एवं निमेष से प्रलय एवं सृष्टि हुआ करते हैं (हम) उस शक्ति-समूह के वैभव के आदि कारणभूत (स्रष्टा) शङ्कर की स्तुति करते हैं। ❉ सरोजिनी ❉ 'यस्य'—जिसके। अर्थात् जिस विश्व-स्रष्टा एवं विश्व-संहर्ता शिव के। 'उन्मेष' = नेत्रोन्मीलन। 'निमेष'—नेत्र-निमीलन॥ 'जगतः'—विश्व का। 'प्रलयोदयौ' = विश्व-संहार रूप प्रलय एवं उदयरूप विश्व-सृष्टि। 'तं' = उनको। 'शक्तिचक्रविभव- प्रभवं' = शक्तिसमूह के वैभव को उत्पन्न करने वाले (शिव) को॥ 'शङ्करं' = कल्याण करने वाले, भगवान् शिव को। 'स्तुमः'—स्तवन करते हैं। विशेषार्थ—'उन्मेष' एवं 'निमेष'—भगवान् शिव का चक्षु उन्मीलन ही 'सृष्टि' है एवं उनका नेत्रोन्मीलन ही 'प्रलय' है। नेत्रोन्मीलन ही 'उन्मेष' है और 'निमीलन' ही प्रलय है।